आर्थिक समृद्धि में ब्रान्डिंग के साथ, क्वालिटी प्रोडक्ट की उपलब्धता अहम सहज अवसर संसाधनों से सिद्ध होगा सामर्थ, और होगी मजबूत अर्थव्यवस्था आर्थिक समृद्धि से बढेगी अर्थव्यवस्था
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज जब देश में 5 ट्रिलेयन की अर्थव्यवस्था बनाने की चर्चा सरगर्म है और बिगडती अर्थव्यवस्था को सम्हालने डोज पर डोज बूस्टर डोज दिये जा रहे है तो वहीं दूसरी ओर देश विदेशी निवेश बढाने के साथ मेड इन इंडिया के सपनों को साकार करने 1.45 लाख के बूस्टर डोज तक दिये जा रहे है।
कहते है किसी भी वृहत अर्थ व्यवस्था के लिये आर्थिक समृद्धि सबसे अहम होती है और आर्थिक समृद्धि तब आती है जब अर्थव्यवस्था से जुढे हर अंग को स्वच्छंद ज्ञान के साथ सहज संसाधन तथा प्रतिभा प्रदर्शन के सहज अवसर उपलब्ध है। क्योंकि बाजार के लिये ब्रान्डिग के साथ क्वालिटी प्रोडक्ट होना अवश्य है। फिर क्षेत्र, मार्केटिंग, निर्माण उत्पादन का हो या सेवा सुरक्षा का जब तक गुणवत्ता पूर्ण उत्पाद और उसकी सहज उपलब्धता न हो तब तक बेहतर से बेहतर ब्रान्डिंग न काफी ही साबित होगी और हमारी मौजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो इसलिये भी यह कठिन कार्य है कि संचालक या निर्णय मण्डल में अहम भूमिका गिरोहबंद संस्कृति या पितृ, परिवार तथा विचार संस्कृति के चलते अब विद्या, विद्यवान, प्रतिभा, योजना आयडिया का कोई मूल्य नहीं, न ही इनके संरक्षण सम्बर्धन की प्रमाणिक कोई सहज व्यवस्था। परिणाम कि हमारे पास एक से बढकर एक विद्या विद्यवान प्रतिभा, संसाधन प्रचूर संपदा, ज्ञान होने के बावजूद हम और हमारे लोग धक्के खा दर दर ठोकरे खाने पर मजबूर है। कारण सत्ता संगठनों में भय का व्याप्त होना। जिस परिवार, समाज, राष्ट्र में विद्या विद्यवान, ज्ञान प्रतिभा को उसके पुरूषार्थ सामर्थ अनुसार स्थान संरक्षण सम्मान नहीं मिलता तथा विद्याचोरी का साम्राज्य धन, बाहुबल आधारित हो वहां समृद्धि नहीं सिर्फ कंगाली परेशानी का साम्राज्य बन सकता है। कोई भी सत्ता सभा, परिषद इस कटु सच से इतर जन व भावुक जनमानस को कुछ समय के लिए बहला तो सकती है, मगर आर्थिक समृद्धि नहीं दिला सकती। क्योंकि जो मार्ग समृद्धि की ओर जाते है। वह तो आज भी बंद पडे है। जिस मार्ग पर बडी अर्थव्यवस्था का प्रमाणिक रूप से कल्याण हो सकता है उन मार्गो को अंधी बेहरी सत्ता सुख में लिप्त सभा सत्ता, परिषदों को बताये कौन ? क्योंकि सत्ता, संगठन संचालन की नई संस्कृति में पता ही नहीं कि कहानीकार, संचालक डायरेक्ट कौन है। साॅशल मीडिया और निर्जीव संवाद संस्कृति से जो नाश जीवन्त लोकतंत्र, संगठन, संस्थाओं और इस महान राष्ट्र का हो रहा है। इस कलंक से बगैर सुधार किये हमें न तो आर्थिक और न ही सामरिक समृद्धि प्राप्त हो सकती है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज जब देश में 5 ट्रिलेयन की अर्थव्यवस्था बनाने की चर्चा सरगर्म है और बिगडती अर्थव्यवस्था को सम्हालने डोज पर डोज बूस्टर डोज दिये जा रहे है तो वहीं दूसरी ओर देश विदेशी निवेश बढाने के साथ मेड इन इंडिया के सपनों को साकार करने 1.45 लाख के बूस्टर डोज तक दिये जा रहे है। कहते है किसी भी वृहत अर्थ व्यवस्था के लिये आर्थिक समृद्धि सबसे अहम होती है और आर्थिक समृद्धि तब आती है जब अर्थव्यवस्था से जुढे हर अंग को स्वच्छंद ज्ञान के साथ सहज संसाधन तथा प्रतिभा प्रदर्शन के सहज अवसर उपलब्ध है। क्योंकि बाजार के लिये ब्रान्डिग के साथ क्वालिटी प्रोडक्ट होना अवश्य है। फिर क्षेत्र, मार्केटिंग, निर्माण उत्पादन का हो या सेवा सुरक्षा का जब तक गुणवत्ता पूर्ण उत्पाद और उसकी सहज उपलब्धता न हो तब तक बेहतर से बेहतर ब्रान्डिंग न काफी ही साबित होगी और हमारी मौजूद लोकतांत्रिक व्यवस्था में तो इसलिये भी यह कठिन कार्य है कि संचालक या निर्णय मण्डल में अहम भूमिका गिरोहबंद संस्कृति या पितृ, परिवार तथा विचार संस्कृति के चलते अब विद्या, विद्यवान, प्रतिभा, योजना आयडिया का कोई मूल्य नहीं, न ही इनके संरक्षण सम्बर्धन की प्रमाणिक कोई सहज व्यवस्था। परिणाम कि हमारे पास एक से बढकर एक विद्या विद्यवान प्रतिभा, संसाधन प्रचूर संपदा, ज्ञान होने के बावजूद हम और हमारे लोग धक्के खा दर दर ठोकरे खाने पर मजबूर है। कारण सत्ता संगठनों में भय का व्याप्त होना। जिस परिवार, समाज, राष्ट्र में विद्या विद्यवान, ज्ञान प्रतिभा को उसके पुरूषार्थ सामर्थ अनुसार स्थान संरक्षण सम्मान नहीं मिलता तथा विद्याचोरी का साम्राज्य धन, बाहुबल आधारित हो वहां समृद्धि नहीं सिर्फ कंगाली परेशानी का साम्राज्य बन सकता है। कोई भी सत्ता सभा, परिषद इस कटु सच से इतर जन व भावुक जनमानस को कुछ समय के लिए बहला तो सकती है, मगर आर्थिक समृद्धि नहीं दिला सकती। क्योंकि जो मार्ग समृद्धि की ओर जाते है। वह तो आज भी बंद पडे है। जिस मार्ग पर बडी अर्थव्यवस्था का प्रमाणिक रूप से कल्याण हो सकता है उन मार्गो को अंधी बेहरी सत्ता सुख में लिप्त सभा सत्ता, परिषदों को बताये कौन ? क्योंकि सत्ता, संगठन संचालन की नई संस्कृति में पता ही नहीं कि कहानीकार, संचालक डायरेक्ट कौन है। साॅशल मीडिया और निर्जीव संवाद संस्कृति से जो नाश जीवन्त लोकतंत्र, संगठन, संस्थाओं और इस महान राष्ट्र का हो रहा है। इस कलंक से बगैर सुधार किये हमें न तो आर्थिक और न ही सामरिक समृद्धि प्राप्त हो सकती है।
जय स्वराज
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