राज्य, समाज और युवाओं की समृद्धि, खुशहाली के लिये पुरूषार्थ, समय की जरूरत

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है किसी भी राज्य, समाज के बेहतर भविष्य निर्माण में सत्ता सरकार, सभा, परिषद एवं जीवंत शिक्षित समाज विधा, विद्ववान, शिक्षकों चुने हुये गांव, गली के जनप्रतिनिधि और निवासरत बौद्धिक रूप से समृद्ध लोगों की अहम भूमिका होती है। कहते है कि जब किसी भी राज्य में लोकतांत्रिक आधार पर सेवा, कल्याण विकास के नाम सत्ता हासिल कर अपने कत्र्तव्यों में अक्षम, असफल, संगठन, संस्थाओं की उपस्थिति बढ़ने लगने लगती है और व्यवस्था सड़ांध मारने पर मजबूर। ऐसे में उस राज्य के कत्र्तव्यनिष्ठ जबावदेह लोगों को दायित्व होता है कि वह नये सिरे से समीक्षा कर ऐसी संस्थायें, संगठन लोकतांत्रिक आधार पर खड़े करें जिससे उनकी सत्ता का मार्ग प्रस्त हो सके और वह अपनी आशा-आकांक्षा सपने अनुसार ऐसी सत्ता, सरकारे, सभा, परिषद स्थापित करें जो ईमानदार, निष्ठा, सेवा भावी एवं कल्याणकारी हों और यह तभी संभव है जब विगत 4 दशक तक सत्ता में रह पुनः सत्ता में काबिज राजनैतिक दल या जो पूर्व में 20 वर्ष में सत्ता भोग चुके सत्ता भोगी दलों से सियासी संघर्ष का रास्ता तय कर संघर्षपूर्ण तैयार हो। 
क्योंकि जो दल 45 वर्षो में मूल्य सिद्धान्त आधारित नीतियां क्रियान्वित करने में अक्षम, असफल रहे उनसे क्या उम्मीद की जा सकती है। जिन लोगों ने नई व्यवस्था निर्माण कर लोगों के सपने साकार करने का तानाबाना बुना वो लोग भी लोगों का जीवन समृद्ध, खुशहाल नहीं बना सके। उनसे से भी क्या उम्मीद की जा सकती है। चूंकि जब दोनों ही प्रभावी दल अपने-अपने सतत सत्ता स्वार्थ में डूबे हो ऐसे में सेवा कल्याण का मार्ग कौन तय करें। मगर यहां समझने वाली बात यह है कि किसी भी दल में मात्र 500 या हजार लोगों का प्रयास और पुरूषार्थ सत्ता से किसी को भी संगठनात्मक आधार पर बेदखल करता है या सत्ता हासिल कर सेवा कल्याण के नाम सत्ता सुख भोगता है। अगर म.प्र. की ही बात करें तो 6 करोड़ के लगभग जनसंख्या वाले प्रदेश में जीवन मूल्य सिद्धान्तों की रक्षा सर्वकल्याण, बेहतर शिक्षा और सम्मानजनक रोजगार के लिये अगर संगठनात्मक तौर पर एक हजार लोग तैयार हो सत्ता तक पहुंचने का संकल्प लें, लोकतांत्रिक तरीके से मार्ग तय करने को अपना कत्र्तव्य मान आगे बढ़ते है। तो केाई कारण नहीं कि पीड़ित, वंचित, आभावग्रस्त, रोजगार, मान-सम्मान को मोहताज लोगों के बीच उन्हें समर्थन न मिले। मगर सौ टके का सवाल कि इस अर्थयुग में इसकी शुरूआत करें कौन। अगर आज भी हम ऐसे संगठन और संस्थाओं के सहारे स्वयं की सेवा कल्याण के लिये बैठे रहे तो वह दिन दूर नहीं कि जब हम अपनी तीन पीढ़ियों की तरह अपना जीवन भी झूठे वायदे, आश्वासन के सहारे निर्वहन को मजबूर हो। 

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