रिटायरमेंट की उम्र में, प्रभावी भूमिका को तैयार सोनिया
वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
25 वर्ष पुरानी टीम के साथ एक मर्तवा फिर से काॅग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी अपनी प्रभावी सियासी भूमिका में नजर आ रहीं है। जिस तरह से वह सियासी संगठनात्मक तौर पर निर्णय ले रहीं है उससे साफ है कि अगले कुछ वर्ष काॅग्रेस की बागडोर बुजुर्ग अनुभवी हाथों में ही काॅरपोरेट संगठनात्मक कल्चर के आधार पर ही चलने व रहने वाली है और काॅरपोरेट कल्चर के आधार पर ही सियासी संगठन खड़ा करने की तैयारी है। यह अलहदा बात है कि वर्तमान बदले सियासी परिवेश में पूर्व काॅग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी स्वयं को मौजूद सियासत में चाहकर भी प्रभावी ढंग से स्थापित नहीं कर सके या फिर उन सियासी उस्तादों ने उन्हें स्थापित ही नहीं होने दिया। जिन्हें अपने-अपने पद, संगठनात्मक, सियासी हुकूब जाने का डर था। अब जबकि सोनिया गांधी कह चुकी है कि सोशल मीडिया के साथ सडकों पर संघर्ष भी जरूरी है। शायद वह यह समझने में सफल रही कि सिर्फ निर्जीव, तकनीक, सोशल मीडिया का सत्य क्या है और जीवन्त जुडाव क्या ? सच से कोसो दूर केपिंन आधार यह तकनीक सिर्फ काफी नहीं। जिस सोशल मीडिया व जीवंत, संपर्क के माध्यम से काॅग्रेस मात्र 10 वर्ष में अर्स से फर्स तक तथा जिन सियासी उस्तादों की सियासत के चलते विपक्षी दल सत्ता तक पहुंच अपना मजबूत संगठनात्मक आधार खडा करने में कामयाब रहा उसके पीछे उसका मजबूत वैचारिक संगठनात्मक आधार और केंपिन आधारित सोशल मीडिया ही रहा है। जिसमें समय परिस्थिति अनुसार युवा क्षमतावान नेतृत्व को भी मुक्त हस्त से मौका दिया गया। शायद विगत 25 वर्षो में काॅग्रेस ऐसा नहीं कर सकी कि सिर्फ दरबारी बफादारी के वैचारिक आधार में उलझ अपनी संगठनात्मक और वैचारिक क्षमता को निस्तानाबूत करती रही। जो क्रम शायद आज भी जारी है।
देखना होगा जब आज सोनिया को सियासी संघर्ष के साथ मजबूत संगठन और ऐसे युवा तुर्को की तर्क शक्ति से पूर्ण वैचारिक फौज चाहिए जो नैतिक आधार पर ही नहीं चारित्रिक आधार पर भी विपक्ष का सामना करने तैयार हो और जो काॅग्रेस का मूल वैचारिक आधार राष्ट्र भक्ति जनसेवा को स्थापित कर सके। मगर काॅग्रेस में मौजूद परिवार, पिता, पत्नि, बेटा, विरासत की संस्कृति से जब तक निछले स्तर पर काॅग्रेस मुक्त नहीं होगी और ऐसे क्षत्रप नेताओं से जिनकेे यहां पहली प्राथमिकता चापलूसी, चाटूकारिता से ही काॅग्रेस को मुक्त नहीं होती तब तक काॅग्रेस में ऐसा कोई बड़ा चमत्कार नहीं होने वाला जिसकी मिशाल दी जा सके। मगर जब तक राहुल जैसे मूल्य सिद्धान्तों की राजनीति करने वाले युवा लोगों को मौका नहीं मिलता तब तक सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा। बेहतर हो कि काॅग्रेस आलाकमान अपने नये सियासी अंदाज के साथ दरबारी क्षेत्रीय क्षत्रपों से दूर स्व. राजीव की तरह युवा की फौज, सेवा वैचारिक आधार पर खडी करें। बरना राजनीति के घाग अपनी राजनीति तो बचा लेंगे। मगर राजीव गांधी के सपने और राहुल के मूल सिद्धान्तों की राजनीति को कहीं का नहीं छोडेंगे जो महात्मा गांधी, पं. नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के खून और बलिदान पर खडी काॅग्रेस के साथ और काॅग्रेस की विरासत के साथ बडा अन्याय होगा।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
25 वर्ष पुरानी टीम के साथ एक मर्तवा फिर से काॅग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी अपनी प्रभावी सियासी भूमिका में नजर आ रहीं है। जिस तरह से वह सियासी संगठनात्मक तौर पर निर्णय ले रहीं है उससे साफ है कि अगले कुछ वर्ष काॅग्रेस की बागडोर बुजुर्ग अनुभवी हाथों में ही काॅरपोरेट संगठनात्मक कल्चर के आधार पर ही चलने व रहने वाली है और काॅरपोरेट कल्चर के आधार पर ही सियासी संगठन खड़ा करने की तैयारी है। यह अलहदा बात है कि वर्तमान बदले सियासी परिवेश में पूर्व काॅग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी स्वयं को मौजूद सियासत में चाहकर भी प्रभावी ढंग से स्थापित नहीं कर सके या फिर उन सियासी उस्तादों ने उन्हें स्थापित ही नहीं होने दिया। जिन्हें अपने-अपने पद, संगठनात्मक, सियासी हुकूब जाने का डर था। अब जबकि सोनिया गांधी कह चुकी है कि सोशल मीडिया के साथ सडकों पर संघर्ष भी जरूरी है। शायद वह यह समझने में सफल रही कि सिर्फ निर्जीव, तकनीक, सोशल मीडिया का सत्य क्या है और जीवन्त जुडाव क्या ? सच से कोसो दूर केपिंन आधार यह तकनीक सिर्फ काफी नहीं। जिस सोशल मीडिया व जीवंत, संपर्क के माध्यम से काॅग्रेस मात्र 10 वर्ष में अर्स से फर्स तक तथा जिन सियासी उस्तादों की सियासत के चलते विपक्षी दल सत्ता तक पहुंच अपना मजबूत संगठनात्मक आधार खडा करने में कामयाब रहा उसके पीछे उसका मजबूत वैचारिक संगठनात्मक आधार और केंपिन आधारित सोशल मीडिया ही रहा है। जिसमें समय परिस्थिति अनुसार युवा क्षमतावान नेतृत्व को भी मुक्त हस्त से मौका दिया गया। शायद विगत 25 वर्षो में काॅग्रेस ऐसा नहीं कर सकी कि सिर्फ दरबारी बफादारी के वैचारिक आधार में उलझ अपनी संगठनात्मक और वैचारिक क्षमता को निस्तानाबूत करती रही। जो क्रम शायद आज भी जारी है। देखना होगा जब आज सोनिया को सियासी संघर्ष के साथ मजबूत संगठन और ऐसे युवा तुर्को की तर्क शक्ति से पूर्ण वैचारिक फौज चाहिए जो नैतिक आधार पर ही नहीं चारित्रिक आधार पर भी विपक्ष का सामना करने तैयार हो और जो काॅग्रेस का मूल वैचारिक आधार राष्ट्र भक्ति जनसेवा को स्थापित कर सके। मगर काॅग्रेस में मौजूद परिवार, पिता, पत्नि, बेटा, विरासत की संस्कृति से जब तक निछले स्तर पर काॅग्रेस मुक्त नहीं होगी और ऐसे क्षत्रप नेताओं से जिनकेे यहां पहली प्राथमिकता चापलूसी, चाटूकारिता से ही काॅग्रेस को मुक्त नहीं होती तब तक काॅग्रेस में ऐसा कोई बड़ा चमत्कार नहीं होने वाला जिसकी मिशाल दी जा सके। मगर जब तक राहुल जैसे मूल्य सिद्धान्तों की राजनीति करने वाले युवा लोगों को मौका नहीं मिलता तब तक सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा। बेहतर हो कि काॅग्रेस आलाकमान अपने नये सियासी अंदाज के साथ दरबारी क्षेत्रीय क्षत्रपों से दूर स्व. राजीव की तरह युवा की फौज, सेवा वैचारिक आधार पर खडी करें। बरना राजनीति के घाग अपनी राजनीति तो बचा लेंगे। मगर राजीव गांधी के सपने और राहुल के मूल सिद्धान्तों की राजनीति को कहीं का नहीं छोडेंगे जो महात्मा गांधी, पं. नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के खून और बलिदान पर खडी काॅग्रेस के साथ और काॅग्रेस की विरासत के साथ बडा अन्याय होगा।
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