सृजन में सार्थक सक्रियता और यथार्थ चरित्र ही समाधान है नैतिक जीवन मूल्यों का तर्पण समृद्ध, खुशहाल जीवन का मार्ग

व्ही.एस.भुल्ले 
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है कि समृद्ध, संस्कृति के सामर्थ से विदेशी सत्तायें न तो कभी अनभिज्ञ रही, न ही उसे कभी दरकिनार कर सकी और न ही वह स्थापित भारतीय संस्कृति के खिलाफ वह सामर्थ जुटा सकी। जिससे वह अपनी उपनिवेशित सोच को स्थाई रूप से मूर्तरूप दे पाती। मगर हमने भ्रमपूर्ण जीवन मूल्य अपना नई संस्कृति को आत्मसात कर अपने पूर्वजों की समृद्ध, खुशहाल विरासत को ही अनजाने में ही सही कलंकित करने का मार्ग प्रस्त किया। जिसके दुष्परिणाम हर क्षेत्र में हमारे सामने है। फिर वह व्यक्ति परिवार, समाज, धर्म, अर्थ, राजनीति का क्षेत्र हो या हमारा पुरूषार्थ और सामर्थ। हमने हमारी महान संस्कृति से अनभिज्ञ रह नैतिक चरित्र पतन के एक से बढकर एक कीर्तिमान स्थापित किये। अब इसके पीछे के कारण जो भी रहे हो। कहते है मानवीय जीवन और सृजन में कारण और कारक तो पहले भी रहे है और समाधान भी आये। जो हमारे ग्रन्थ, शास्त्र इतिहास में दर्ज है तथा महा मानव महापुरूषों के नाम व उनके चरित्र भी दर्ज है और उनकी जीव, जगत, मानवता के प्रति रही कृतज्ञता भी सुनहरे अक्षरों में उल्लेखित है। मगर आज जब हम एक ऐसी कृतज्ञता, चरित्र की 150वीं जन्म जयंती मना रहे है। तब की स्थिति जब हम अपने उस नैसर्गिक चरित्र को खोते जा रहे है। जिससे विदेशी  हुकूमत भी कांपती थी और विदेशी आक्रान्ता, शासक होने के बावजूद भी सार्वजनिक रूप से नैतिकता को दरकिनार करने में स्वयं को असहज अक्षम महसूस करते थे। भले ही वह अपने सत्ता बल के आधार पर अनैतिक को भी नैतिक दर्शाने में सक्षम रहे हो। 
मगर दुर्भाग्य कि आयतित संस्कृति के चलते हमारी महान समृद्ध, खुशहाल, संस्कृति, संस्कार धुंधले हो हमें एक ऐसे अधंकार की ओर ले आये है जहां से रोशनी एक मर्तवा फिर से कोसो दूर नजर आती है। क्योंकि अब न तो सृजन में सार्थक वह शिक्षा न ही वह अदम्य साहस, सामर्थ से भरा स्वास्थ हमारे बीच है, न ही वह समाज जो सृजक सार्थक चरित्र को आत्मसात कर जीवन की सार्थकता सिद्ध कर सके, न ही गांव, गली, नगर, शहर, महानगरों में ऐसे विद्यालय, रंगमंच कला प्रदर्शन के स्वच्छंद मंच और न ही उन्हें, सुन, निहार संरक्षण दे सम्वर्धन करने वाले व्यक्तित्व और न ही विद्यवत्ता को आदन प्रदान करने के ऐसे सभागार जहां से प्रतिभायें अपना प्रदर्शन कर स्वयं के पुरूषार्थ के मानव जगत को अवगत करा सृजन में अपना योगदान दें स्वच्छंद रूप से अपना कत्र्तव्य निर्वहन कर सके। 
दुर्भाग्य कि नैतिक कलंकों से सनी गिरोहबंद, तथाकथित मण्डलियों के आगे दम तोडती नैतिकता, अब स्वयं भ्रमित है। इसमें किसी को अति संयोक्ति नहीं होना चाहिए। ऐसे में इस महान भूभाग पर सिर्फ एक गांधी ही नहीं कई गांधी और यथार्थ चरित्रों की आवश्यकता होगी समाधान देने में। मगर सवाल फिर वहीं सौ टके का है कि आज स्वयं का सूट, बूट, वैभव, एश्वर्य, सौहरत छोड गांव, गली, गरीब बैजुबानों की खातिर त्याग तपस्या कौन करे कौन सत्य के लिए अपना सम्पूर्ण समर्पण दे। कहते है कि जब तक बोली और बाॅडी लेंग्यूज में समानता और उपदेश, आचरण, चित और चरित्र में समानता न हो तब तक समझ और समझाइस, सुधार समाधान, खुशहाली, समृद्धि अधूरी ही रहने वाली है। 
जय स्वराज

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