मूल आधार खोती विरासत बंटाढार सोच सियासत के आगे गिड़गिड़ाती समृद्धि खुशहाली

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स  समाचार सेवा।
कहते हैं किसी भी जीव जगत मानवीय सभ्यता, संस्कृति का मूल आधार उसकी उत्पत्ति सृजन और अंत के बीच जीवन को समृद्ध, खुशहाल बनाने वाली वह विरासत होती है। जो उसे वंशानुगत रूप में प्रारब्ध से प्राप्त होती है। उसकी अपनी संस्कृति और संस्कार होते हैं। मगर किसी भी सभ्य समृद्ध समाज में उसकी संस्कृति, संस्कार बंटाढार सोच सियासत का शिकार हो और समृद्धि, खुशहाली गिड़गिड़ाने मजबूर हो, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य उस सभ्यता संस्कृति, समृद्ध, खुशहाल विरासत का कोई और नहीं हो सकता।
खासकर समृद्ध, सुसंस्कृत, संस्कृति के उत्तराधिकारी इस सच को जितनी जल्दी समझ पाएं उतना बेहतर होगा वैसे भी सुधार को लेकर बड़ी देर हो चुकी है और कई पीढ़ियों संघर्षपूर्ण जीवन के बावजूद अभावग्रस्त रह इस कड़वे दंश के साथ विदा ले चुकी है। अब न तो  हमारे बीच वह समृद्ध स्वस्थ शिक्षा, स्वास्थ्य और संसाधन रहे जिसके लिए हम महान समृद्ध, खुशहाल जीवन की विरासत के उत्तराधिकारी के रूप में विश्व भर में जाने जाते है। मगर आज बंटाढार सोच सियासत के चलते मानवीय नस्ल बतौर जिस मुकाम पर है ऐसे में हम महान विरासत के उत्तराधिकारियों का अब कत्र्तव्य नहीं जबावदेही है कि हम स्वयं को न सही कम से कम अपनी मौजूद युवा पीढ़ी या भावी पीढ़ी के लिए एक ऐसी शिक्षा, स्वास्थ्य, संस्कृति युक्त कृतज्ञता और कर्म भूमि सौंप जाये जिससे वह अर्थ के साथ अपने खुशहाल जीवन का मार्ग प्रस्त कर अपने सपनों को साकार कर सके। मगर यह तभी संभव है जब हम शेष बचे मौजूद सामर्थ के बल बंटाढार सोच सियासत से इतर एक ऐसी सियासत संसाधन मुहैया कराये जो समृद्धि, खुशहाली ही नहीं सृजन में सहायक हो। 
जय स्वराज 

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