विजन के आभाव में शुरू होने से पूर्व ही दम तोड़ती महत्वकांक्षी योजना सृजन में कत्र्तव्य ही जबावदेही ही सिद्धता होगी
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
वर्षो से वेमौत मरने पर मजबूर हमारे बेजुबान पशुधन को विगत 1 वर्ष पूर्व गांव-गांव गौशाला खोलने की घोषणा से एक बडी उम्मीद मानवीय जगत में बनी थी। जिसके लिए स्वराज विगत एक दशक से राष्ट्र के कामधेनु वर्ग के मान-सम्मान एवं पुर्न स्थापन के लिए संकल्पित है और अपने संसाधनों के बीच संघर्षरत था। गांधी जी के इस विचार को आगे ले जाते हुये कि उच्च साध्य की प्राप्ति हेतु उत्तम साधन अहम होते है। इसी तारतम्य में स्वराज द्वारा एक वैचारिक अभियान की शुरूआत की जिसमें मानव सभ्यता एवं जीव, जगत के कल्याण हेतु कामधेनु वर्ग, बच्चे, युवा, बुजुर्गो के कल्याण एवं उनके मान-सम्मान सहित उस महान भूभाग के कल्याण हेतु शुरूआत की गई। जिसमें शिक्षा से लेकर जल सम्वर्धन और फिर गौ संरक्षण हेतु वैचारिक आधार पर नये सिरे से एक शुरूआत हुई।
परिणाम कि जहां म.प्र. सरकार ने अपने वचन, पत्र में हर गांव में गौशाला खोले जाने का वचन मानव जगत को दिया। मगर प्रभावी सोच और क्रियान्वयन का आधार स्पष्ट करता है कि हाालिया तौर पर कोई बडी राहत इस अहम वेजुबान गौवंश को नहीं मिलने वाली। कहते है किसी भी विजन को सिद्ध करने में उसकी समृद्ध सोच का आधार अहम होता है। जिसका सर्वथा आभाव देखा जा रहा है। कारण कि जिस तरह से नैसर्गिक आधार पर हजारों वर्ष से संरक्षित गौचर भूमि और प्राकृतिक संसाधनों चारा, पानी आदि पर गौवंश का अधिकार था उसे निहित स्वार्थ और वोटों की राजनीति ने उस अधिकार से गौवंश को वंचित कर दिया और जब अब गांव, गांव गौशाला खोले जाने की शुरूआत हुई है। ऐसे में जबावदेह लोगों की सिथिल कार्य प्रणाली और गौवंश के लिए सबसे अहम नैसर्गिक संसाधन जल, जंगल, जमीन और नैसर्गिक साथियों का आभाव इसी बात का प्रमाण है कि सत्ता के लिए मौजूद सिर्फ सियासत में सेवा, कल्याण अब दूर की कोणी होती जा रही है। बरना वचन देने वालों के 1 वर्ष पूरा होने को है और वेजुबान गौवंश के नैसर्गिक अधिकार छिने लगभग 30 वर्ष पूर्ण होने को है। ऐसे में स्वयं स्वार्थ में डूबी मानवता और वोट सत्ता नीति में डूबी सियासत से सटीक समाधान फिलहाल निकल पाना मुश्किल ही नहीं नममुकिन है लगता है। क्योंकि सियासी लोग सत्ता उन्मुख सियासत तो कर सकते। मगर जमीनी सेवा कल्याण में वर्तमान माहौल में अपनी सिद्धता साबित कर सके यह फिलहाल असंभव ही जान पडता है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
वर्षो से वेमौत मरने पर मजबूर हमारे बेजुबान पशुधन को विगत 1 वर्ष पूर्व गांव-गांव गौशाला खोलने की घोषणा से एक बडी उम्मीद मानवीय जगत में बनी थी। जिसके लिए स्वराज विगत एक दशक से राष्ट्र के कामधेनु वर्ग के मान-सम्मान एवं पुर्न स्थापन के लिए संकल्पित है और अपने संसाधनों के बीच संघर्षरत था। गांधी जी के इस विचार को आगे ले जाते हुये कि उच्च साध्य की प्राप्ति हेतु उत्तम साधन अहम होते है। इसी तारतम्य में स्वराज द्वारा एक वैचारिक अभियान की शुरूआत की जिसमें मानव सभ्यता एवं जीव, जगत के कल्याण हेतु कामधेनु वर्ग, बच्चे, युवा, बुजुर्गो के कल्याण एवं उनके मान-सम्मान सहित उस महान भूभाग के कल्याण हेतु शुरूआत की गई। जिसमें शिक्षा से लेकर जल सम्वर्धन और फिर गौ संरक्षण हेतु वैचारिक आधार पर नये सिरे से एक शुरूआत हुई। परिणाम कि जहां म.प्र. सरकार ने अपने वचन, पत्र में हर गांव में गौशाला खोले जाने का वचन मानव जगत को दिया। मगर प्रभावी सोच और क्रियान्वयन का आधार स्पष्ट करता है कि हाालिया तौर पर कोई बडी राहत इस अहम वेजुबान गौवंश को नहीं मिलने वाली। कहते है किसी भी विजन को सिद्ध करने में उसकी समृद्ध सोच का आधार अहम होता है। जिसका सर्वथा आभाव देखा जा रहा है। कारण कि जिस तरह से नैसर्गिक आधार पर हजारों वर्ष से संरक्षित गौचर भूमि और प्राकृतिक संसाधनों चारा, पानी आदि पर गौवंश का अधिकार था उसे निहित स्वार्थ और वोटों की राजनीति ने उस अधिकार से गौवंश को वंचित कर दिया और जब अब गांव, गांव गौशाला खोले जाने की शुरूआत हुई है। ऐसे में जबावदेह लोगों की सिथिल कार्य प्रणाली और गौवंश के लिए सबसे अहम नैसर्गिक संसाधन जल, जंगल, जमीन और नैसर्गिक साथियों का आभाव इसी बात का प्रमाण है कि सत्ता के लिए मौजूद सिर्फ सियासत में सेवा, कल्याण अब दूर की कोणी होती जा रही है। बरना वचन देने वालों के 1 वर्ष पूरा होने को है और वेजुबान गौवंश के नैसर्गिक अधिकार छिने लगभग 30 वर्ष पूर्ण होने को है। ऐसे में स्वयं स्वार्थ में डूबी मानवता और वोट सत्ता नीति में डूबी सियासत से सटीक समाधान फिलहाल निकल पाना मुश्किल ही नहीं नममुकिन है लगता है। क्योंकि सियासी लोग सत्ता उन्मुख सियासत तो कर सकते। मगर जमीनी सेवा कल्याण में वर्तमान माहौल में अपनी सिद्धता साबित कर सके यह फिलहाल असंभव ही जान पडता है।
जय स्वराज
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