गेधुओं के हाथ, गंगा स्नान की कमान...............तीरंदाज ? कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था की व्यथा

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
भैया- स्वच्छता, सिंग्गल प्लास्टिंग पाबन्दी जल संरक्षण के दौर में 10 मिनिट में हन्ड्रेड तो 5 मिनिट फिफ्टी, इन्क्लेव और दे दनादन डिवेटोें के बीच लगता है कि तू एक्सक्लुसिव पढ़ रहा है। लगता है हरियाणा ही नहीं महाराष्ट्र चुनाव से भी थारा टिकिट कट गया है। 
भैये- मुये चुप कर म्हारे को तो उफनती गंगा में जंगली जानवर जीव जन्तुओं के गंगा स्नान के कवरेज का ठेका मिल गया है। 
भैया- तो क्या 2 अहम प्रदेशों में होने वाले सत्ता परिषदों के चुनावों का थारी नजर में कोई मूल्य नहीं। जिससे हमारा कत्र्तव्यनिष्ठ लोकतंत्र चलने वाला है। विगत 72 वर्ष में न सही अब तो थारे जैसे चित्रकार, पत्रकार, काले पीले पन्ने वालों का जीवन समृद्ध खुशहाल होने वाला है। 
भैये- खैर तू फिलहाल तो कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था में समृद्धि, खुशहाली के सपने छोड मने तो यह पता कि जीव जन्तुओं के गंगा स्नान कवरेज का ठेका तुझे कहां मिला ? 
भैया- सुनना चाहे तो सुन म्हारे धर्म ग्रन्थों में वान्यप्रस्थ आश्रम का पूरा अध्याय है। सो मने तो आजादी से पूर्व 1 अगस्त को 50 का होते ही वान्यप्रस्थ की तैयारी में जंगल निकल लिया। जहां पूरे लोकतांत्रिक तरीके से निष्ठापूर्वक ढंग से जंगली जानवर जीव जन्तुओं ने अपना राजा अगले एक वर्ष के लिए शेर का वंशज मान गेधुओं के झुण्ड को चुन लिया और हाथों हाथ देश भर में उफनती गंगा में स्नान का प्रस्ताव रख लिया। फिर क्या था मुझे अकिल्ले पत्रकार को देख पहले आओ पहले पाओ के आधार पर गंगा स्नान के कबरेज का ठेका मिल गया। बोल भैया कैसी रही।
भैये- ये सब तो ठीक है मगर म्हारे गले यह बात नहीं उतर रही कि शेर, टाइगर, तेन्दुओं के कुनवे को छोड गेधुओं का झुण्ड कैसे राजा चुन गया और हाथों हाथ गंगा स्नान का जिम्बा भी गेधुओं के झुण्ड को मिल गया।
भैया- तने तो बावला शै कै थारे को मालूम कोणी लोकतांत्रिक व्यवस्था में वोट बहुमत सत्ता का आधार होता है। सो सभी ने गंगा स्नान सुरक्षित करने के चलते ऊंचे हाथ, गर्दन वाले टाइगर के निशानधारी गेधुुओं को चुना है। जो ठीक से जल स्तर नाप सुरक्षित गंगा स्नान करा सकता है। क्योंकि शेरों की नस्ल में गेधुुओं ही ऐसा जानवर है। जिसकी खाल पर टाइगर जैसे निशान तथा चार पैरों में से आगे के दो पैर बढे और गर्दन ऊंची होती है। 
भैये- कहते है कि गंगा स्नान डुबकी लगाने पर ही पूर्ण माना जाता है और यह रहे जंगली जानवर, जीव जन्तु। अगर अपने लम्बे पैर गर्दन के चलते गेधुुओं बगैर डुबकी लगाये सभी को लौटा लाया तो फिर यह निरीह जीव जन्तु जानवर तो बगैर गंगा स्नान के ही रह जायेंगे और छोटे मोटे जानवर तो उफनती गंगा में वेभाव ही वह जायेंगे।
भैया- मैं राजा नहीं न ही गेधुुओं का झुण्ड हूं मने तो सिर्फ कवरेज उसके बाद डिवेट फिर 50-100 दनादन एक्सलुसिव के लिए अधिकृत हूं। न कि गंगा स्नान के सपने पूर्ण करने। 
भैये- भाड में जाये थारा वान्यप्रस्थ मने तो समझ लिया, तने भी कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन की बात कर रिया शै। काश तने म्हारे महान लोकतंत्र में ऐसी निष्ठा दिखाई होती तो आज म्हारी कत्र्तव्य विमुख व्यवस्था ऐसी विमूड अव्यवस्थित अराजक दिखाई नहीं देती और न ही कहीं अग्नि, तो कहीं बारिस, तो कहीं म्हारी महान नदियां अपना रौद्र रूप दिखा रही होती और न ही बिलबिलाती वोटो की फौज इस तरह जल मग्न हो गांव, गली, शहरों में रात नहीं बिता रही होती। 
जय स्वराज

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