कब मुक्त होंगे सिंधिया, सियासी सेंधमारों से

विलेज टाइम समाचार सेवा
यूं तों भारतीय राजनीति में चुनावी हार-जीत के एक से बढकर एक उदाहरण, मूल्य, सिद्धान्त, जीवन, मूल्यों की राजनीति करने वाले नेताओं के रहे है। जिसमें बाबा साहब से लेकर स्व. इन्दिरा गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी, अर्जुन सिंह तथा वर्तमान में राहुल गांधी, कमलनाथ, दिग्विजय सिंह इत्यादि नाम भी इस लोकतांत्रिक सियासत में सुमार रहे है। अगर ऐसे में सियासी सेंधमारी के चलते सिंधिया को भी राष्ट्रवाद, मोदी लहर या अन्य कारणो ंसे हार से दो-चार होना पडा है तो यह आज की राजनीति की न तो पहली शुरूआत है और न ही आखिरी।
मगर इसके उलट अगर हम देखे तो अपने गुना संसदीय क्षेत्र में ही नहीं, समूचे ग्वालियर-चम्बल संभाग में एक से बढकर एक लीक से हटकर अप्रत्याशित हजारों करोड की योजनाओं को ला, उनको मूर्तरूप देने वाले सिंधिया अपने सार्वजनिक जीवन में भी कभी सामाजिक सरोकार से दूर नहीं रहे और समय वेसमय सुख दुख की घडी में क्षेत्र के लोगों के बीच आते-जाते बने रहे, जो कि उनके सार्वजनिक जीवन की जबावदेही के कत्र्तव्य निर्वहन की आदत में सुमार है। मगर उनके सियासी कुनवे या कुनवे के बाहर बढती सेंधमारों की फौज या सियासी विरोधियों का बढता कारवां इस बात का प्रमाण है कि कहीं न कहीं कोई न कोई चूक उनके कारवां में अवश्य है। अगर हम यों कहें कि सिंधिया से सिमपैथी रखने वाले या उनमें आस्था रखने वाले लोगों के साथ सियासी विरोधियों का व्यवहार तो स्वभाविक है। मगर जिस तरह से उन्हीं के सियासी सिपहसालार सिंधिया के शुभचिन्तकों से सियासी व्यवहार करते है वह बडा ही किसी भी बडी सियासी शख्सियत के लिए घातक होता है। परिणाम कि एक ऊर्जावान, चमकदार, परिश्रमी नेतृत्व, क्षमता व सामर्थवान होने के बावजूद सिंधिया अधिकांश युवा, गरीब, तबका या उनके शुभचिन्तक उनके कारवां से उपेक्षित नजर आते है। क्योंकि जिस तरह की गोलबंद सियासत से सिंधिया का व्यक्तित्व उनके समर्थकों के रूप में नजर आता है वह स्वयं सिंधिया को समझने वाली बात है। जिस तरह के घटनाक्रम विगत चुनावों या वर्तमान में घटे है हो सकता है कि वह अप्रत्याशित या सुनियोजित रणनीत का परिणाम हो जिससे इंकार भी नहीं किया जा सकता। अगर इसी तरह सियासी कारवां बढता रहा और मूल सिद्धान्तों की राजनीति में आस्था रखने वाले लोगों का मनोबल गोलबंद सियासत के चलते आगे बढता रहा तो निश्चित है सुधार के बजाये बिगाड के संभावनायें और अधिक प्रबल, आने वाले समय में दिखाई दें तो कोई अतिसंयोक्ति न होगी। क्योंकि वर्तमान हालातों के मद्देनजर जो भविष्य स्थानीय, क्षेत्रीय, राज्य, राष्ट्रीय राजनीति में संभावित दिखाई पडता है वह किसी से छिपा नहीं। ऐसे में मात्र एक ही मार्ग बचता है सजगकता और संवाद का, जो सियासी सेंधमारी से सिंधिया को मुक्ति दिला सकता है। बरना सियासत का क्या यह तो सत्ता प्राप्ति का वह मार्ग है जो कभी-कभी कुछ लोगों को सत्ता या सत्ता शीर्ष तक तो पहुंचा देता है। मगर न तो ऐसी सियासत से सार्थक परिणाम ही प्राप्त होते है और न ही जीवन की सार्थकता सिद्ध हो पाती है।

Comments

Popular posts from this blog

खण्ड खण्ड असतित्व का अखण्ड आधार

संविधान से विमुख सत्तायें, स्वराज में बड़ी बाधा सत्ताओं का सर्वोच्च समर्पण व आस्था अहम: व्ही.एस.भुल्ले

श्राफ भोगता समृद्ध भूभाग गौ-पालन सिर्फ आध्यात्म नहीं बल्कि मानव जीवन से जुडा सिद्धान्तः व्यवहारिक विज्ञान है अमृतदायिनी के निस्वार्थ, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, त्याग तपस्या का तिरस्कार, अपमान पडा भारी जघन्य अन्याय, अत्याचार का दंश भोगती भ्रमित मानव सभ्यता