आज भी अध्यात्म न समझे तो मिट जायेंगे
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
हजारों वर्ष की त्याग-तपस्या पर मातम मनाती मानवता आज जिस मुकाम पर है वह बडा ही दर्दनाक है। जिस मानव पर कभी गर्व होता था और जिस पर समूची संस्कृति गर्व करती थी वह पेड-पौधे, पशु, पक्षी, जानवरों की कृतज्ञता देख इस सृष्टि में उस मानवता को आज शर्मसार होना चाहिए। हो सकता है यह कलयुग का अन्तिम सत्य हो, क्योंकि कालचक्र की गति स्वतः ही निर्धारित होती है और स्वप्रेरित भी।
हो सकता है मौजूद मानव, समाज इस सत्य से सहमत न हो, काश स्वयं स्वार्थ और अहंकार को छोड शायद ही इस सृष्टि का एक भी ऐसा उत्तराधिकारी नहीं जो अपनी कृतज्ञता सिद्ध कर सके। कहते है सृष्टि तो उसकी गोद में मौजूद हर जीव को अपनी संतान मानती है और उसी गर्व गौरव के साथ उसका लालन पालन करती है। मगर, अगर उसकी सर्वोत्तम कृति मानव है जो स्वयं के विनाश की पटकथा लिखने तैयार है तो यह उसका नैसर्गिक गुण और अध्यात्म के अभाव में उसके अधिकार कत्र्तव्य निर्वहन से विमुखता, अहंकार, स्वार्थ है। जो सिर्फ मानव जगत ही नहीं समूचे जीव, जगत के लिए घातक है। फिर पृथ्वी पर मौजूद वह जो भूभाग राज्य, राष्ट्र, नगर, गांव, गली, गरीब हो या कोई भी जीव। बेहतर हो कि अन्य जीवों की भांति हम अपना कत्र्तव्य निर्वहन निष्ठापूर्ण तरीके से अध्यात्म की छत्र छाया में करे यहीें हमारी मूल पहचान आधार है। बरना भविष्य..............?
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
हजारों वर्ष की त्याग-तपस्या पर मातम मनाती मानवता आज जिस मुकाम पर है वह बडा ही दर्दनाक है। जिस मानव पर कभी गर्व होता था और जिस पर समूची संस्कृति गर्व करती थी वह पेड-पौधे, पशु, पक्षी, जानवरों की कृतज्ञता देख इस सृष्टि में उस मानवता को आज शर्मसार होना चाहिए। हो सकता है यह कलयुग का अन्तिम सत्य हो, क्योंकि कालचक्र की गति स्वतः ही निर्धारित होती है और स्वप्रेरित भी। हो सकता है मौजूद मानव, समाज इस सत्य से सहमत न हो, काश स्वयं स्वार्थ और अहंकार को छोड शायद ही इस सृष्टि का एक भी ऐसा उत्तराधिकारी नहीं जो अपनी कृतज्ञता सिद्ध कर सके। कहते है सृष्टि तो उसकी गोद में मौजूद हर जीव को अपनी संतान मानती है और उसी गर्व गौरव के साथ उसका लालन पालन करती है। मगर, अगर उसकी सर्वोत्तम कृति मानव है जो स्वयं के विनाश की पटकथा लिखने तैयार है तो यह उसका नैसर्गिक गुण और अध्यात्म के अभाव में उसके अधिकार कत्र्तव्य निर्वहन से विमुखता, अहंकार, स्वार्थ है। जो सिर्फ मानव जगत ही नहीं समूचे जीव, जगत के लिए घातक है। फिर पृथ्वी पर मौजूद वह जो भूभाग राज्य, राष्ट्र, नगर, गांव, गली, गरीब हो या कोई भी जीव। बेहतर हो कि अन्य जीवों की भांति हम अपना कत्र्तव्य निर्वहन निष्ठापूर्ण तरीके से अध्यात्म की छत्र छाया में करे यहीें हमारी मूल पहचान आधार है। बरना भविष्य..............?
जय स्वराज
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