किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र का नैतिक पतन, उसके विनाश की संभावना मूल अस्तित्व, आधार से बगावत, कुव्यवस्था के संकेत पहचान का प्रमाण ही सृष्टि में जीवन की सार्थकता
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज बात अहम अहंकार की नहीं बात है प्रमाण, प्रमाणिकता के साथ पहचान की है। बात उस चरित्र और नैतिक सम्मान की है जिस पर हर सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र गर्व कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है।
मगर दुर्भाग्य कि जिस तरह से हम करोड़ो वर्ष की त्याग तपस्या को तिलांजलि दे, स्वयं स्वार्थ में डूब स्वयं के जीवन के प्रति कृतज्ञ हो स्वयं को संकल्पित साबित करना चाहते हैं। इससे बड़ी मूखर्तापूर्ण बात जीवन की सार्थकता के मुगालते पालने वालों के लिए और कोई हो नहीं सकती। आज मानवीय जीवन के सामने यही सबसे बड़ा यक्ष सवाल है। हो सकता है कि भले ही इसका हालिया जवाब ना हो मगर विगत 30 वर्षों में जिस तरह के जनमानस का निर्माण विश्व के सबसे समरथ खुुशहाल भाग पर हो चुका है वह दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। मगर हमें मंगूल राजवंश के उस सम्राट को नहीं भूलना चाहिए जो अपने कर्तव्य निर्वहन के साथ स्वयं एवं अपने राष्ट्र की पहचान के लिए अकूत दौलत, शोहरत, सत्ता होने के बावजूद अपने दादा, पिता के साथ युद्ध लड़ अपनी सार्थकता सिद्धता साबित करने में कामयाब रहा। लड़ाका सेना के पस्त हौसलों को सटीक नेतृत्व करने जब उसने नैतिकता चरित्र के कुछ स्थापित मापदंड और उनकी प्रमाणिकता साबित करने तथा सेना में गिरते मनोबल को बढाने अपनी सेना को बताया कि वह उस दादा का नाती है जिसका चेहरा कत्र्तव्य निर्वहन करते-करते कुरूप है और पिता सहित उसके दादा दोनों दिशाओं के मोर्चो पर तैनात है शेष एक दिशा में समृद्ध, खुशहाल स्वयं का राज्य है तो चैथी दिशा में युद्ध जीतकर साम्राज्य स्थापित करना है यह मेरा ही नहीं सभी का कर्तव्य है। वरना एक बड़े साम्राज्य एवं योद्धा दादा पिता का उत्तराधिकारी होने के नाते नये युद्ध मैदान की बजाए महलो में बैठ जीवन निर्माण कर सकता था मगर मेरी पहचान का प्रमाण समृद्ध, खुशहाल दो पीढ़ियों का प्रमाण है यह यथार्थ नहीं एक कटू सत्य है शायद इस सत्य को हम महान राष्ट्र महान नागरिक समझ पाए तो यह हमारे जीवन की भी सार्थकता सिद्धता होगी।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज बात अहम अहंकार की नहीं बात है प्रमाण, प्रमाणिकता के साथ पहचान की है। बात उस चरित्र और नैतिक सम्मान की है जिस पर हर सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य, राष्ट्र गर्व कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करता है।मगर दुर्भाग्य कि जिस तरह से हम करोड़ो वर्ष की त्याग तपस्या को तिलांजलि दे, स्वयं स्वार्थ में डूब स्वयं के जीवन के प्रति कृतज्ञ हो स्वयं को संकल्पित साबित करना चाहते हैं। इससे बड़ी मूखर्तापूर्ण बात जीवन की सार्थकता के मुगालते पालने वालों के लिए और कोई हो नहीं सकती। आज मानवीय जीवन के सामने यही सबसे बड़ा यक्ष सवाल है। हो सकता है कि भले ही इसका हालिया जवाब ना हो मगर विगत 30 वर्षों में जिस तरह के जनमानस का निर्माण विश्व के सबसे समरथ खुुशहाल भाग पर हो चुका है वह दर्दनाक भी है और शर्मनाक भी। मगर हमें मंगूल राजवंश के उस सम्राट को नहीं भूलना चाहिए जो अपने कर्तव्य निर्वहन के साथ स्वयं एवं अपने राष्ट्र की पहचान के लिए अकूत दौलत, शोहरत, सत्ता होने के बावजूद अपने दादा, पिता के साथ युद्ध लड़ अपनी सार्थकता सिद्धता साबित करने में कामयाब रहा। लड़ाका सेना के पस्त हौसलों को सटीक नेतृत्व करने जब उसने नैतिकता चरित्र के कुछ स्थापित मापदंड और उनकी प्रमाणिकता साबित करने तथा सेना में गिरते मनोबल को बढाने अपनी सेना को बताया कि वह उस दादा का नाती है जिसका चेहरा कत्र्तव्य निर्वहन करते-करते कुरूप है और पिता सहित उसके दादा दोनों दिशाओं के मोर्चो पर तैनात है शेष एक दिशा में समृद्ध, खुशहाल स्वयं का राज्य है तो चैथी दिशा में युद्ध जीतकर साम्राज्य स्थापित करना है यह मेरा ही नहीं सभी का कर्तव्य है। वरना एक बड़े साम्राज्य एवं योद्धा दादा पिता का उत्तराधिकारी होने के नाते नये युद्ध मैदान की बजाए महलो में बैठ जीवन निर्माण कर सकता था मगर मेरी पहचान का प्रमाण समृद्ध, खुशहाल दो पीढ़ियों का प्रमाण है यह यथार्थ नहीं एक कटू सत्य है शायद इस सत्य को हम महान राष्ट्र महान नागरिक समझ पाए तो यह हमारे जीवन की भी सार्थकता सिद्धता होगी।
जय स्वराज
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