मातम, मनाती, मानवता गुलछर्रे उडाते भाई लोग.............तीरंदाज ?
व्ही.एस.भुल्ले
भैया- मुये चुप कर जोडी बन्धन की बैला पर गठबंधन से पहले तने कै बोल रिया शै, कै थारे को मालूम कोणी म्हारे महान लोकतंत्र का इतिहास, वर्तमान, भविष्य थारे को नहीं दिख रिया शै। देश में सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की आंधी चल रही है विश्व पटल पर हमारी ख्याति बढ रही है स्वयं की जान बचाने एक महान राष्ट्र की महान सियासत हर रोज, शर्मिन्दा हो कलंकित हो रही है।
भैये- तो स्वयं स्वार्थ में डूबे इस समर युद्ध में मने कै करूं। काडू बोल्या कि आने वाले भविष्य में सत्ता तो हमारे साथ ही आयेगी, क्योंकि अब संस्कृति संस्था हमारे ही होंगे और सभ्यता को भी लोकतंत्र के नाम हम ही गढने वाले होंगे। जिसकी सार्थकता भी होगी और सिद्धता भी।
भैया- गोलबन्द, प्रायवेट लिमिटेड सियासी संस्कृति का यह सच हो सकता है मगर अन्तिम या सम्पूर्ण सच नहीं।
भैये- तो क्या बैचारे उन बेजुबानों, अंधे, बेहरे जीवों की दुनिया निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के पश्चात ऐसे ही वेमौत मारी जायेगी।
भैया- बावले ऐसी कुछ नहीं हमारा लोकतंत्र विधि सम्बत है और हमारे पालन-हार कत्र्तव्य निष्ठ, जबावदेह फिर सवाल क्यों ?
भैये- जब हमारे संवैधानिक कृतज्ञ आजकल सडकों पर झाडू लगा रहे है और हमें हमारा कत्र्तव्य निर्वहन समझा रहे है तथा जनधन से मोटी पगार वेतन के रूप में लेने वाले अक्षम, असमर्थ नजर आ रहे है। ऐसे में इससे बडा निकम्मेपन का प्रमाण और सबूत, वैधानिक तौर पर क्या हो सकता है ऐसे में किसी को हर्ज क्या ?
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा, अब मने भी हाथों हाथ ऐसे श्रंगारी बेरूपीयों की फौज बनाऊंगा जो गोल, गैंगबन्द ही नहीं फुल काॅरपोरेट कल्चर के साथ अपनी पहचान पक्की बनायेगी और म्हारे लोकतंत्र को महान बना ऐसी सत्ता की लकीर खींची जायेगी जिसे मिटाने वालों के हलक ही न सूखे बल्कि उन्हें सत्ता पाने का लाले भी पड जायेंगे म्हारी चली तो थारा भतीजा, मंत्री सो भावी मुख्यमंत्री, नाते, रिश्तेदार सब सत्ता में शामिल हो पायेंगे और म्हारे ही यार-दोस्त अर्थव्यवस्था को आमजन की सेवा में निष्ठापूर्ण ढंग से चलायेंगे। जहां न किसी को भय, भूख, भ्रष्टाचार की शिकायत होगी और सत्ता हमेशा आजू-बाजू ही रहेगी। बोल भैया कैसी रही।
भैया- मुये चुप कर जोडी बन्धन की बैला पर गठबंधन से पहले तने कै बोल रिया शै, कै थारे को मालूम कोणी म्हारे महान लोकतंत्र का इतिहास, वर्तमान, भविष्य थारे को नहीं दिख रिया शै। देश में सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार की आंधी चल रही है विश्व पटल पर हमारी ख्याति बढ रही है स्वयं की जान बचाने एक महान राष्ट्र की महान सियासत हर रोज, शर्मिन्दा हो कलंकित हो रही है।
भैये- तो स्वयं स्वार्थ में डूबे इस समर युद्ध में मने कै करूं। काडू बोल्या कि आने वाले भविष्य में सत्ता तो हमारे साथ ही आयेगी, क्योंकि अब संस्कृति संस्था हमारे ही होंगे और सभ्यता को भी लोकतंत्र के नाम हम ही गढने वाले होंगे। जिसकी सार्थकता भी होगी और सिद्धता भी।
भैया- गोलबन्द, प्रायवेट लिमिटेड सियासी संस्कृति का यह सच हो सकता है मगर अन्तिम या सम्पूर्ण सच नहीं।
भैये- तो क्या बैचारे उन बेजुबानों, अंधे, बेहरे जीवों की दुनिया निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के पश्चात ऐसे ही वेमौत मारी जायेगी।
भैया- बावले ऐसी कुछ नहीं हमारा लोकतंत्र विधि सम्बत है और हमारे पालन-हार कत्र्तव्य निष्ठ, जबावदेह फिर सवाल क्यों ?
भैये- जब हमारे संवैधानिक कृतज्ञ आजकल सडकों पर झाडू लगा रहे है और हमें हमारा कत्र्तव्य निर्वहन समझा रहे है तथा जनधन से मोटी पगार वेतन के रूप में लेने वाले अक्षम, असमर्थ नजर आ रहे है। ऐसे में इससे बडा निकम्मेपन का प्रमाण और सबूत, वैधानिक तौर पर क्या हो सकता है ऐसे में किसी को हर्ज क्या ?
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा, अब मने भी हाथों हाथ ऐसे श्रंगारी बेरूपीयों की फौज बनाऊंगा जो गोल, गैंगबन्द ही नहीं फुल काॅरपोरेट कल्चर के साथ अपनी पहचान पक्की बनायेगी और म्हारे लोकतंत्र को महान बना ऐसी सत्ता की लकीर खींची जायेगी जिसे मिटाने वालों के हलक ही न सूखे बल्कि उन्हें सत्ता पाने का लाले भी पड जायेंगे म्हारी चली तो थारा भतीजा, मंत्री सो भावी मुख्यमंत्री, नाते, रिश्तेदार सब सत्ता में शामिल हो पायेंगे और म्हारे ही यार-दोस्त अर्थव्यवस्था को आमजन की सेवा में निष्ठापूर्ण ढंग से चलायेंगे। जहां न किसी को भय, भूख, भ्रष्टाचार की शिकायत होगी और सत्ता हमेशा आजू-बाजू ही रहेगी। बोल भैया कैसी रही।

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