पशुवत आचार विचार का शिकार होती महान संस्कृति विधान विरूद्ध व्यवहार, महान संविधान को संदेश

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है विधि, विधान संविधान विरूद्ध आचार व्यवहार कभी विधि सम्वत नहीं हो सकता फिर उसका आधार प्राकृतिक, नैसर्गिक हो या फिर संस्कारिक क्योंकि हजारों वर्ष की त्याग-तपस्या बलिदान का प्रमाण इस महान भूभाग पर सत्य की खातिर हजारों लाखो कुर्बानियों के रूप में इतिहास में दर्ज है आज यहीं समझने वाली बात मौजूद मानवता के लिए होना चाहिए। फिर उसकी श्रेणी बच्चे, युवा से लेकर बुजुर्ग की ही क्यों न हो, समझने वाली सबसे अहम बात यह भी है कि अगर सृष्टि, सृजन के हजारों वर्ष बाद पेड-पौधे, पशु-पक्षी अपने कत्र्तव्यों का निष्ठापूर्ण निर्वहन करने में सक्षम है और कर रहे है तो फिर मानवता पर सवाल क्यों ?
क्योकिं आज वह अपनों के बीच अपने ही महान भूभाग पर अक्षम असफल साबित हो रहे है। अगर ऐसा ही बेहिसाब वेदिशा कृतज्ञता का कारवां चलता रहा तो कैसी मानवता और समाज का निर्माण होगा उसे वर्तमान में पैर पसारते विधान विरूद्ध आचार व्यवहार से समझा जा सकता है। बेहतर हो कि हम सत्य को समझे जाने और निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से सत्य को साक्षी मान स्वयं के पुरूषार्थ कृतज्ञता  स्वयं को सिद्ध करे।
जय स्वराज  

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