वन पर्यावरण सुरक्षा के नाम मानवीय, प्राकृतिक संपदा, जीव जगत का भया दोहन शर्मनाक मनमानी विधि में दम तोडता सृजन, समृद्धि का विधान

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
आज जिस तरह का संकट मानव ही नहीं समूचे जीव-जगत सहित एक समृद्ध सृष्टि के सामने स्वार्थवत विधियों के चलते विधान के विरूद्ध आ खडा हुआ है आज उस पर विचार ही नहीं प्रमाणिक व्यापक संवाद की दरकार है। सवाल विधि सम्वत वन और पर्यावरण की सुरक्षा की जबावदेही ओडे उन जबावदेह उन संस्थानों की है जो इसके लिए उत्तरदायी ही नहीं जबावदेह भी है। 
वन पर्यावरण की सुरक्षा निःसंदेह मानव ही नहीं समूचे जीव जगत के संरक्षण, सम्बर्धन एवं सृष्टि विधान को संरक्षित करने अहम है। अगर हम विज्ञान को छोड अध्यात्म की बात करें तो कहते है कि संतुलन ही प्रकृति की नियम है और प्रकृति स्वयं को सुरक्षित संरक्षित करने में संक्षम है। मगर कहते है कि प्राकृतिक शक्तियां आज भी मानवीय सोच से अंजान और अदृश्य है तथा विज्ञान हजारों वर्ष की विरासत को समेटे आज भी प्राकृतिक उथल-पुथल और प्रकृति के नियम सिद्धान्तों आचरण, व्यवहार, संस्कृति के प्रमाणिक सूत्र स्थापित करने में अक्षम, असफल रहा है। अगर विज्ञान के पास कोई पूर्व अनुमान या प्रमाणिक तथ्य मौजूद भी है तो वह आज भी प्राकृतिक हलचल का पूर्व अनुमान या उसे रोक पाने में असफल है। बावजूद इसके कि आज जितनी उपायदेयता आध्यात्म आधारित, विज्ञान या विज्ञान से प्राप्त नवाचार की है उन सबके मद्देनजर प्रकृति को सबसे पहली जरूरत उन क्षेत्रों को समझने और सृजन में उसको विस्तार देने की है जिससे प्रकृति समृद्ध बन सृजन में सहायक सिद्ध हो। हमें या समूचे मानव जगत को यह नहीं भूलना चाहिए कि समूची सृष्टि और सृजन में मानव ही एक ऐसा जीव है जिसकी जबावदेही समूचे जीव जगत के संरक्षण सम्बर्धन की है। मगर विगत कुछ वर्षो में जिस तरह से स्वार्थवत मानवता ने अज्ञानता बस प्रकृति संरक्षण के माप दण्ड तय किये है वह सृजन के बजाये विनाशकारी साबित हो रहे है। अगर भारतवर्ष में ही हम देंखे तो जिस तरह से औषधीय फलदार वन और पर्यावरण को शुद्ध रखने वाले वृक्षों की उपेक्षा हुई है तथा जिस तरह से वनीय पेड पौधे वृक्षों के पौष्टिक भोजन की उपेक्षा हुई है दुग्ध उत्पादक पशु या गौवंश के जंगलों में चरने की रोक और उनके जंगलों में जाने की पाबंदी तथा वृक्षारोपण में औषधीय फलदार, आॅक्सीजन प्रदान करने वाले वृक्षों की उपेक्षा कर विभिन्न प्रकार के नस्लीय पौधों को रोपित किये गये है। उसने समूचे जीव जगत का जीवन चक्र ही प्रभावित कर दिया है। परिणाम कि आज जंगली जीव भोजन, पानी से मेहरूम हो शहरों की ओर दौड रहे है तो शिकारी अज्ञानता बस स्वार्थ के चलते जंगली जीवों का शिकार करने से नहीं चूकते तथा गौवंश सहित दूध, खाद एवं एक स्थान से दूसरे स्थान पर विभिन्न पेड-पौधों के बीज पहुंचाने वाले जानवर, जीव, जन्तुओं के बिगडे चक्र के चलते शुद्ध पौष्टिक खाद पानी के आभाव में हरे भरे घने जंगल झाडियों के रूप में तब्दील हो रहे है। अब इसे विडंबना कहे या वन पर्यावरण से जुडी संस्थाओं और प्रशिक्षित उन विद्ववानों का निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन या कत्र्तव्य विमुखता जो आज एक ओर फल औषधीय वृक्षा का दायरा सिमट रहा है तो वहीं गौवंश भूखे और प्यासे मरने पर मजबूर तो वहीं खेती किसानी करने वाला गरीब किसान प्राकृतिक आपदायें झेलने पर मजबूर है। ऐसे में सही गलत क्या है इस पर विधा, विद्ववान, वैज्ञानिक ही नहीं हर नागरिक को खुला संवाद सभा इत्यादि के माध्यम से आपसी विचार विमर्श अवश्य करना चाहिए। जिससे मानव जाति सृष्टि ही नहीं प्रकृति की खातिर अपने मानवीय जीवन की सार्थकता सिद्धता सिद्ध कर सके। आज समूचे मानव जगत को समझने वाली सबसे बडी बात होना चाहिए। 

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