सरकार चाहती तो 1 वर्ष में म.प्र. एक मजबूत अर्थव्यवस्था और रोजगार के हब का साक्षी होता सियासी स्वार्थवत सिद्धता यशमेन मूडधन्य सलाहकारों ने निकाला सत्ता का दिवाला नहीं लिया मुख्यमंत्री ने समाधान पर संज्ञान संविधान निर्माता या ग्राम स्वराज सहित अन्तोदय में आस्था रखने वाले सत्तासीनों ने अगर इन मूल्य मंत्रों को समझा होता तो भारतीय जनमानस ही नहीं म.प्र. के समृद्ध सशक्त संसाधन और युवाओं को आभाव बेरोजगारी का दंश नहीं झेलना पडता है।
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
म.प्र. में एक योग्य अनुभवी सक्षम निर्णायक नेतृत्व तथा संपदा संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद परिणाम एक वर्ष में सिफर नजर आये तो सिस्टम पर सवाल होना स्वभाविक है और सराहना के बजाये सवाल तो सत्ता सरकार और उसके मुखिया से भी होना स्वभाविक है। मगर माफिया के खिलाफ आंशिक उपलब्धि भर से म.प्र. में लगभग 7 करोड के प्रति सेवा, कल्याण की सिद्धि नहीं हो सकती, न ही इससे गांव, गली, गरीब, युवा, बेरोजगार, बुजुर्गो का जीवन सहज रूप से निर्वहन हो सकता। जिसके लिए आवश्यक है म.प्र. में स्व-संचालित मजबूत अर्थव्यवस्था जिससे लोग अपना जीवन निर्वहन पूर्व निष्ठा के साथ अपनी आशा-आकांक्षा अनुरूप कर पाये। मगर दुर्भाग्य कि निर्णायक क्षमतावान नेतृत्व और मुख्यमंत्री म.प्र. में होने के बावजूद भी स्वार्थवत सियासी सिद्धता ने ऐसा होने नहीं दिया। सत्ता में हिस्सेदारी की रेवडिया इस तरह बंटी या सियासी संगठन की भेली गुड की तरह ऐसी जमी कि चींटी-चेटो, मक्खी, ततईयों के पौ-बारह हो लिये।
बहरहाल सवाल वहीं कि गांव, गली, गरीब को केन्द्र व राज्य सरकारों के नवगठन के पश्चात आखिर सिर्फ सिफर ही हासिल क्यों हुआ। यूं तो देश के प्रधानमंत्री, म.प्र. के मुख्यमंत्री को एक नहीं दो-दो मर्तवा राष्ट्र-जन के कल्याण की खातिर स्वराज की ओर से ई-मेल से सुझाव पत्र भेजे गये, इतना ही नहीं पूर्व मुख्यमंत्री से मुलाकात कर म.प्र. में रोजगार मजबूत अर्थव्यवस्था के संबंध में संवाद भी हुये और सहमति भी बनी। मगर पूर्व मुख्यमंत्री ऐसा नहीं कर सके और सिद्धस्ता प्राप्त करती स्वार्थवत सियासत तथा सत्ता अहंकार में गांव, गली, गरीब की समृद्धि के सपने स्वाहा हो गये। अगर ऐसे में म.प्र. के मुख्यमंत्री म.प्र. की जनता से एक वर्ष के कार्यकाल का सीधा रिपोर्ट कार्ड चाहते तो उन्हें आमजन, सृजन में सहभागिता कर, स्वयं का निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कत्र्ताओं से सीधा संवाद करना चाहिए। क्योंकि जब भी सवाल होगा तो माननीय आपसे ही होगा, न कि स्वार्थवत सियासी सिद्धता में जुटे लोगों से और न ही आभावग्रस्त काम के आभाव में घूमते उन लोगों से जिन्हें आपसे बडी अपेक्षा है विचार आपको करना है कि म.प्र. की सरकार को केन्द्र सरकार की तरह गली, मौहल्लों में बट रहे ब्याज पर रिण लेने वालों के आंकडे रोजगार के रूप में जुटाना है या फिर एक मजबूत अर्थव्यवस्था और प्रमाणिक रोजगार दें, स्वयं की प्रमाणिकता सिद्ध कर, स्वयं की सिद्धता सिद्ध करना है। अगर सरकार चाहे तो मात्र 6 माह में लगभग 13 लाख और एक वर्ष में 26 लाख लोगों को सम्मानित स्थाई रोजगार मौजूद संसाधनों के बीच अतिरिक्त धन खर्च किये बिना जुटा सकती है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
म.प्र. में एक योग्य अनुभवी सक्षम निर्णायक नेतृत्व तथा संपदा संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद परिणाम एक वर्ष में सिफर नजर आये तो सिस्टम पर सवाल होना स्वभाविक है और सराहना के बजाये सवाल तो सत्ता सरकार और उसके मुखिया से भी होना स्वभाविक है। मगर माफिया के खिलाफ आंशिक उपलब्धि भर से म.प्र. में लगभग 7 करोड के प्रति सेवा, कल्याण की सिद्धि नहीं हो सकती, न ही इससे गांव, गली, गरीब, युवा, बेरोजगार, बुजुर्गो का जीवन सहज रूप से निर्वहन हो सकता। जिसके लिए आवश्यक है म.प्र. में स्व-संचालित मजबूत अर्थव्यवस्था जिससे लोग अपना जीवन निर्वहन पूर्व निष्ठा के साथ अपनी आशा-आकांक्षा अनुरूप कर पाये। मगर दुर्भाग्य कि निर्णायक क्षमतावान नेतृत्व और मुख्यमंत्री म.प्र. में होने के बावजूद भी स्वार्थवत सियासी सिद्धता ने ऐसा होने नहीं दिया। सत्ता में हिस्सेदारी की रेवडिया इस तरह बंटी या सियासी संगठन की भेली गुड की तरह ऐसी जमी कि चींटी-चेटो, मक्खी, ततईयों के पौ-बारह हो लिये। बहरहाल सवाल वहीं कि गांव, गली, गरीब को केन्द्र व राज्य सरकारों के नवगठन के पश्चात आखिर सिर्फ सिफर ही हासिल क्यों हुआ। यूं तो देश के प्रधानमंत्री, म.प्र. के मुख्यमंत्री को एक नहीं दो-दो मर्तवा राष्ट्र-जन के कल्याण की खातिर स्वराज की ओर से ई-मेल से सुझाव पत्र भेजे गये, इतना ही नहीं पूर्व मुख्यमंत्री से मुलाकात कर म.प्र. में रोजगार मजबूत अर्थव्यवस्था के संबंध में संवाद भी हुये और सहमति भी बनी। मगर पूर्व मुख्यमंत्री ऐसा नहीं कर सके और सिद्धस्ता प्राप्त करती स्वार्थवत सियासत तथा सत्ता अहंकार में गांव, गली, गरीब की समृद्धि के सपने स्वाहा हो गये। अगर ऐसे में म.प्र. के मुख्यमंत्री म.प्र. की जनता से एक वर्ष के कार्यकाल का सीधा रिपोर्ट कार्ड चाहते तो उन्हें आमजन, सृजन में सहभागिता कर, स्वयं का निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कत्र्ताओं से सीधा संवाद करना चाहिए। क्योंकि जब भी सवाल होगा तो माननीय आपसे ही होगा, न कि स्वार्थवत सियासी सिद्धता में जुटे लोगों से और न ही आभावग्रस्त काम के आभाव में घूमते उन लोगों से जिन्हें आपसे बडी अपेक्षा है विचार आपको करना है कि म.प्र. की सरकार को केन्द्र सरकार की तरह गली, मौहल्लों में बट रहे ब्याज पर रिण लेने वालों के आंकडे रोजगार के रूप में जुटाना है या फिर एक मजबूत अर्थव्यवस्था और प्रमाणिक रोजगार दें, स्वयं की प्रमाणिकता सिद्ध कर, स्वयं की सिद्धता सिद्ध करना है। अगर सरकार चाहे तो मात्र 6 माह में लगभग 13 लाख और एक वर्ष में 26 लाख लोगों को सम्मानित स्थाई रोजगार मौजूद संसाधनों के बीच अतिरिक्त धन खर्च किये बिना जुटा सकती है।
जय स्वराज
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