देश के पुरूषार्थ पर स्वार्थवत, सियासी सवाल शर्मनाक झपट मार खेल से मीडिया की मुक्ति अहम

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सत्य के नजदीक काॅग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, सांसद राहुल गांधी का सवाल के पीछे जो भी छिपा हो और मंच से दिया व्यान भले ही सियासी हो, लेकिन देश में लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ के रूप में मौजूद तथाकथित मीडिया से इस महान राष्ट्र, सभ्यता, संस्कृति और यहां के भोले-भाले भावुक नागरिकों को सजग रहना अहम है।
अब अपने राष्ट्र की खातिर, आजादी के सिपाही राष्ट्र भक्त वीर सावरकर के संघर्ष के वक्त स्थिति अपना पुरूषार्थ साबित करते वक्त क्या रही इस सत्य को मौजूद इतिहास साक्षी है। राष्ट्र के प्रति उनकी कृतज्ञता को लेकर अंग्रेजों द्वारा उन्हें दी गई काले पानी की सजा यातनायें, महात्मा गांधी से उनका संवाद, ये यथार्थ भी है और प्रमाण भी। मगर राहुल जिस तरह से सावरकर गांधी के अन्तर को अपने कार्यकत्र्ताओं को यह बताने की कोशिश कि वे सत्य के लिए मरना पसंद करगेंगे, मगर माफी नहीं मागेंगे। यह उनका अपना मूल्य सिद्धान्त है जिसकी सिद्धता की उम्मीद राष्ट्र को अवश्य की जानी चाहिए। क्योंकि व्यक्ति के जीवन मूल्य और सत्य के लिए किया गया पुरूषार्थ की सृष्टि में मानव को महामानव होने की उसकी सिद्धता साबित करता है। मगर सबसे शर्मनाक कृत्य झपटमार तथाकथित मीडिया का है। जो अर्थ को अनर्थ बना या सिर्फ सवाल का माध्यम बन अपनी कृतज्ञता साबित करने में स्वयं के धन्य समझता है।
मगर जिस तरह से त्याग, तपस्या और राष्ट्र की खातिर स्वयं को स्वाहा करने वाली महान हस्तियों, महामानवों की आड में स्वार्थवत सियासी सवाल जबावों का दौर चल निकला है इससे न तो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और उस महान संस्कृति की सिद्धता होगी और न ही मानवीय जीवन की और न ही उस पुरूषार्थ की जिसने सृष्टि ही नही समूचे जीव-जगत और महान संस्कृति, मानवता की खातिर बचपन, बुढापा ही नहीं जबानी के रूप में अनगिनत कुर्बानियां दी और मानवीय जीवन के रूप में अपनी सिद्धता सिद्ध की, आज महामानवों के वंशज और विरासत को सबसे बड़ी समझने वाली बात यहीं होना चाहिए।

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