सुंदर, सुविधायुक्त, सड़कों के नाम विधि संवत, मनमानी, जनधन भावनाओं की लूट आधी अधूरी घटिया सड़कों का दंश झेलता देश स्वच्छंद सरकार की छवि को पलीता लगाता एन.एच.आई.
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
घने जंगलों को काट, हरे भरे वृक्षों को पुनः रोपित कर हरियाली लौटाने तथा चिकनी साफ सुंदर सुविधायुक्त सडक मुहैया कराने विधि संवत शुल्क वसूली कराने वाला एन.एच.आई. कभी गुणवत्ता साफ सुंदर सड़क सड़क निर्माण इकाई के रूप में जाना जाता था जिसका जन्म ही शायद साफ-सुथरी गुणवत्तापूर्ण सड़क निर्माण के लिए हुआ। मगर दुर्भाग्य कि जिस तरह से इसकी ख्याति आज मनमानी विधि संवत पठानी बसूली और घटिया सड़क निर्माण सहित जन भावनाओं की लूट के रूप में बढ़ रही है वह दर्दनाक ही नहीं शर्मनाक भी कही जाएगी।
मगर यहां सबसे बड़ा सवाल राष्ट्र, जन सेवा में जुटी केंद्र सरकार पर है जिसकी चमकदार फिजा पर आखिर एन.एच.आई. क्यों कालिख पोतने में जुटी है। सुंदर सर्वसुविधायुक्त सुरक्षित सड़कों के नाम पर देश का नागरिक परिवहन कर से लेकर बीमा, पेट्रोलियम पदार्थ में वेट अन्य वस्तुओं में जीएसटी कर के अलावा एन.एर्च.ए.आइ. द्वारा हर 60 किलो. पर सडक शुल्क चुकाने के बावजूद कटी फटी हरियाली विहीन एवं पेट्रोलिंग वाहन एम्बूलेंस, हेडर सुविधा से मोहताज ऊंट डिजाइन पुल पुलिया व सरफेस विहीन सडकों पर आज लोग यात्रा करने पर वैवस मजबूर है। फटती सड़कें, दरकते पुल और जलने से पूर्व बुझी पडी पुलों पर स्ट्रीट लाइटें जगह-जगह क्षत-विच्क्षत सेफ्टी रेलिंग दुर्घटनाओं में मौत का कारण बन रहे है। मगर टोलो पर होती विधि संवत पठानी बसूली पर कोई सवाल नहीं। रहा सवाल राज्य सरकारों का तो राज्य सरकारें संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों का अपने कत्र्तव्य से विमुख होना कई सवाल खडे करता है। पठानी बसूली विधि संवत टोल के रूप में पठानी बसूली रोकने में अक्षम हमारे आईएस, आईपीएस स्तर के अधिकारी जिन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है वह भी इन टोलों के आगे अक्षम, असफल साबित होने पर मजबूर है। शायद कत्र्तव्य विमुखता के दौर में जवाबदेह लोग यह भूल रहे है कि देश का नागरिक जनतंत्र, लोकतंत्र की रीढ होता है। जो देश के विधान, संविधान को अंगीकार कर उसे मजबूत और सम्मान योग बनाती है। मगर व्यवस्थाओं में अपनी पहचान के उलट प्रबल होती कत्र्तव्य विमुख संस्कृति अपनी सभ्य संस्कृति को बचाने में असफल रही और नागरिकों में अपनी संस्थाओं से विश्वास जाता रहा है। तो फिर कैसे ये व्यवस्थायें और लोकतंत्र को चलाने वाली संस्थायें भी सुरक्षित रहेंगी जिनका भरण पोषण किसी भी संस्था द्वारा मनमाने ढंग से सेवा सुविधा के नाम मनमानी शुल्क बसूली की छूट देती है और स्वार्थपूर्ण जीवन निर्वहन को लोग अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन समझते है। अब विचार देश की सत्ता, सरकारों व जबावदेह संस्थाओं को करना है।
घने जंगलों को काट, हरे भरे वृक्षों को पुनः रोपित कर हरियाली लौटाने तथा चिकनी साफ सुंदर सुविधायुक्त सडक मुहैया कराने विधि संवत शुल्क वसूली कराने वाला एन.एच.आई. कभी गुणवत्ता साफ सुंदर सड़क सड़क निर्माण इकाई के रूप में जाना जाता था जिसका जन्म ही शायद साफ-सुथरी गुणवत्तापूर्ण सड़क निर्माण के लिए हुआ। मगर दुर्भाग्य कि जिस तरह से इसकी ख्याति आज मनमानी विधि संवत पठानी बसूली और घटिया सड़क निर्माण सहित जन भावनाओं की लूट के रूप में बढ़ रही है वह दर्दनाक ही नहीं शर्मनाक भी कही जाएगी।
मगर यहां सबसे बड़ा सवाल राष्ट्र, जन सेवा में जुटी केंद्र सरकार पर है जिसकी चमकदार फिजा पर आखिर एन.एच.आई. क्यों कालिख पोतने में जुटी है। सुंदर सर्वसुविधायुक्त सुरक्षित सड़कों के नाम पर देश का नागरिक परिवहन कर से लेकर बीमा, पेट्रोलियम पदार्थ में वेट अन्य वस्तुओं में जीएसटी कर के अलावा एन.एर्च.ए.आइ. द्वारा हर 60 किलो. पर सडक शुल्क चुकाने के बावजूद कटी फटी हरियाली विहीन एवं पेट्रोलिंग वाहन एम्बूलेंस, हेडर सुविधा से मोहताज ऊंट डिजाइन पुल पुलिया व सरफेस विहीन सडकों पर आज लोग यात्रा करने पर वैवस मजबूर है। फटती सड़कें, दरकते पुल और जलने से पूर्व बुझी पडी पुलों पर स्ट्रीट लाइटें जगह-जगह क्षत-विच्क्षत सेफ्टी रेलिंग दुर्घटनाओं में मौत का कारण बन रहे है। मगर टोलो पर होती विधि संवत पठानी बसूली पर कोई सवाल नहीं। रहा सवाल राज्य सरकारों का तो राज्य सरकारें संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों का अपने कत्र्तव्य से विमुख होना कई सवाल खडे करता है। पठानी बसूली विधि संवत टोल के रूप में पठानी बसूली रोकने में अक्षम हमारे आईएस, आईपीएस स्तर के अधिकारी जिन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है वह भी इन टोलों के आगे अक्षम, असफल साबित होने पर मजबूर है। शायद कत्र्तव्य विमुखता के दौर में जवाबदेह लोग यह भूल रहे है कि देश का नागरिक जनतंत्र, लोकतंत्र की रीढ होता है। जो देश के विधान, संविधान को अंगीकार कर उसे मजबूत और सम्मान योग बनाती है। मगर व्यवस्थाओं में अपनी पहचान के उलट प्रबल होती कत्र्तव्य विमुख संस्कृति अपनी सभ्य संस्कृति को बचाने में असफल रही और नागरिकों में अपनी संस्थाओं से विश्वास जाता रहा है। तो फिर कैसे ये व्यवस्थायें और लोकतंत्र को चलाने वाली संस्थायें भी सुरक्षित रहेंगी जिनका भरण पोषण किसी भी संस्था द्वारा मनमाने ढंग से सेवा सुविधा के नाम मनमानी शुल्क बसूली की छूट देती है और स्वार्थपूर्ण जीवन निर्वहन को लोग अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन समझते है। अब विचार देश की सत्ता, सरकारों व जबावदेह संस्थाओं को करना है।

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