माननीय श्रीमानों हम एक मर्तवा फिर से अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में अक्षम, असफल सिद्ध हुये पैचाचिक कृत्य से कंलकित हुई मानवता पशु-पक्षी जीवों पर गर्व होना चाहिए
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस मानवता पर प्रकृति, सृष्टि, सृजन के लिए निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पर गर्व रहा है। आज उस उच्च जीवन मूल्यों वाली मानवता को शर्मसार कर दिया है। यूं तो समस्त जीव, जगत के सृजन में संरक्षण, सम्बर्धन की जबावदेही मानव की ही रही है। मगर जबावदेही से इतर वह जीवन मूल्यों को लेकर हमारी निष्ठायें नंपुशक साबित होती रही है वहीं सामाजिक परम्परायें, संस्कार, आज अवलाओं की श्रेणी में है। धिक्कार होना चाहिए ऐसे पुरूषार्थ और कृत्यों पर जो विरासत को कलंकित करने काफी हो। एक ऐसी महान विरासत जहां मातृ-शक्ति को पूज्यनीय मान उन्हें पूजा जाता है और सामाजिक सरोकारों को लेकर मातृ-शक्ति की रक्षा के लिए प्राणों तक का बलिदान हो जाता है। आज हमें गर्व नहीं शर्म से कंलकित होना चाहिए। क्योंकि जिस तरह के कृत्य समाज के अन्दर सडकों पर नजर आ रहे है फिर चाहे वह दिल्ली, हैदराबाद के मामले हो या अन्य जघन्य मामले इस तरह के कृत्य कभी भी उस महान विरासत को उस मानवता को गौरान्वित करने वाले नहीं हो सकते, जिसका लोहा सारे विश्व में माना जाता रहा है।
मगर माननीय, श्रीमानों आप तो हमारे अपने है हमारे ही बीच से है और हम सबकों मिलकर इसी समाज में रहना है। आपको संवैधानिक ही नहीं वैद्यानिक तौर पर हमने हमारे महान संविधान को अंगीकार कर, पैदा होने से लेकर मरने तक का विधि सम्वत समस्त अधिकार सौंप रखे है। इतना ही नहीं भूखे, प्यासे रह, खून पसीने से कमाया धन टेक्स के रूप में शासन को हम इसलिए देते है कि वैद्यानिक पदों पर बैठे लोग समाज को दिशा देने वालो लोग हमें अच्छी शिक्षा, संस्कृति, संस्कारयुक्त माहौल मुहैया करायेंगे और हमारे जीवन की रक्षा करेंगे। हमारे राष्ट्र को अक्षुण रखेंगे। उसके लिए विधि, बंगला, गाडी-घोडा, सैनिक, पुलिस सभी तो आपके पास है। फिर मानवता आज क्यों कलंकित हो, शर्ममिन्दा है कुछ तो करों, निश्चित है कि एक जबावदेह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पश्चात हमें इसी पवित्र संपदा से समृद्ध और संस्कारों से ओत-प्रोत समूचे समाज के साथ इस महान भूभाग पर रहना है। जहां हमारे मौजूद या आने वाली पीढियों का स्वच्छंद जीवन, निर्वहन हो, इतना ही नहीं हमें भी आज नहीं तो कल अपनी-अपनी जीवन यात्रा पूर्ण कर अपने नैसर्गिक जीवन का निर्वहन करना है। अब विचार सभी को करना है कि हम एक समृद्ध, खुशहाल समाज, राष्ट्र व जबावदेह, व्यवस्था कैसे बना सकते है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
जिस मानवता पर प्रकृति, सृष्टि, सृजन के लिए निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पर गर्व रहा है। आज उस उच्च जीवन मूल्यों वाली मानवता को शर्मसार कर दिया है। यूं तो समस्त जीव, जगत के सृजन में संरक्षण, सम्बर्धन की जबावदेही मानव की ही रही है। मगर जबावदेही से इतर वह जीवन मूल्यों को लेकर हमारी निष्ठायें नंपुशक साबित होती रही है वहीं सामाजिक परम्परायें, संस्कार, आज अवलाओं की श्रेणी में है। धिक्कार होना चाहिए ऐसे पुरूषार्थ और कृत्यों पर जो विरासत को कलंकित करने काफी हो। एक ऐसी महान विरासत जहां मातृ-शक्ति को पूज्यनीय मान उन्हें पूजा जाता है और सामाजिक सरोकारों को लेकर मातृ-शक्ति की रक्षा के लिए प्राणों तक का बलिदान हो जाता है। आज हमें गर्व नहीं शर्म से कंलकित होना चाहिए। क्योंकि जिस तरह के कृत्य समाज के अन्दर सडकों पर नजर आ रहे है फिर चाहे वह दिल्ली, हैदराबाद के मामले हो या अन्य जघन्य मामले इस तरह के कृत्य कभी भी उस महान विरासत को उस मानवता को गौरान्वित करने वाले नहीं हो सकते, जिसका लोहा सारे विश्व में माना जाता रहा है। मगर माननीय, श्रीमानों आप तो हमारे अपने है हमारे ही बीच से है और हम सबकों मिलकर इसी समाज में रहना है। आपको संवैधानिक ही नहीं वैद्यानिक तौर पर हमने हमारे महान संविधान को अंगीकार कर, पैदा होने से लेकर मरने तक का विधि सम्वत समस्त अधिकार सौंप रखे है। इतना ही नहीं भूखे, प्यासे रह, खून पसीने से कमाया धन टेक्स के रूप में शासन को हम इसलिए देते है कि वैद्यानिक पदों पर बैठे लोग समाज को दिशा देने वालो लोग हमें अच्छी शिक्षा, संस्कृति, संस्कारयुक्त माहौल मुहैया करायेंगे और हमारे जीवन की रक्षा करेंगे। हमारे राष्ट्र को अक्षुण रखेंगे। उसके लिए विधि, बंगला, गाडी-घोडा, सैनिक, पुलिस सभी तो आपके पास है। फिर मानवता आज क्यों कलंकित हो, शर्ममिन्दा है कुछ तो करों, निश्चित है कि एक जबावदेह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पश्चात हमें इसी पवित्र संपदा से समृद्ध और संस्कारों से ओत-प्रोत समूचे समाज के साथ इस महान भूभाग पर रहना है। जहां हमारे मौजूद या आने वाली पीढियों का स्वच्छंद जीवन, निर्वहन हो, इतना ही नहीं हमें भी आज नहीं तो कल अपनी-अपनी जीवन यात्रा पूर्ण कर अपने नैसर्गिक जीवन का निर्वहन करना है। अब विचार सभी को करना है कि हम एक समृद्ध, खुशहाल समाज, राष्ट्र व जबावदेह, व्यवस्था कैसे बना सकते है।
जय स्वराज
Comments
Post a Comment