सत्ता की हनक और सुख भोगते स्वार्थवत लोग छल से छल्ली हुई आशा-आकांक्षायें
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
बैवस मजबूर आभावग्रस्त लोकतंत्र में स्वार्थवत लोगों की सत्ता लूट को सभ्य समाज भले ही भ्रष्टाचार करार दें और इस नाम का विलाप कर दुखती रग और कलेजे को ठण्डा कर लिया जाये। मगर लोकतंत्र में सेवा कल्याण विकास के नाम छल से छल्ली हुई आशा-आकांक्षायें आज भी चींख-चींख अपनी बैवसी का बखान करती नहीं थकती। जिस तरह से आज से 26 वर्ष पूर्व म.प्र. की पटवा सरकार 16 वर्ष पूर्व दिग्विजय सरकार और 1 वर्ष पूर्व शिवराज सरकार को गांव, गली के गरीबों ने वोट की ताकत से तख्ता पलट कर धूल चटाई वह समूचे म.प्र. में किसी से छिपा नहीं। फिर इन सरकारों के दल काॅग्रेस, भाजपा रहे हो या फिर सियासी दांव पैंच से यह सरकारें सत्ता में आने के बाद स्वयं सिद्ध रही हो। मगर आम गांव, गली, गरीब, बेरोजगारों की कौम को कुछ हासिल नहीं हो सका और ना ही म.प्र. के युवाओं को सम्मानित रोजगार मिल सका, ना ही वह उन संसाधनों के हक पाने लायक रहे जिनकी लूट सत्ता के संरक्षण में स्वार्थवत लोगों द्वारा बड़ी ही बेरहमी से विगत 26 वर्षो में की गई और आज भी विधि की आड़ में और सत्ता की हनक के आगे जारी है।
यह समृद्ध म.प्र. का दुर्भाग्य कहा जायेगा कि समृद्ध, जीवन और सम्मानित रोजगार तथा नैसर्गिक सहज सुविधाओं के आभाव में पूरी दो पीढ़ियां इस आकांक्षा में स्वाहा हो गईं कि आज नहीं तो कल उनके बच्चे भी उच्च पदों पर आसीन होंगे, कहीं तो वह सत्ता के सहभागी बनेंगे, ना कुछ सही तो सम्मानित रोजगार सहज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और शुद्ध पेयजल तो प्राप्त कर सकेंगे। मगर ना तो इन 26 वर्षो में यह सत्तायें ऐसा कर सकी और ना ही स्वार्थवत सियासत के बीच ऐसा हो सका। मगर लोकतंत्र में जिस तरह से सत्ता में वंशवाद, सत्ता सियासवाद स्थापित है और चरण चुम्बन की संस्कृति स्वार्थवत हावी है उसे देखकर कहा जा सकता है कि एक सशक्त, समृद्ध, लोकतंत्र स्वार्थवत सियासत के आगे आज शैया पर निढाल पढा है, तो वहीं दूसरी ओर सर्वकल्याण के सिद्धान्त से दूर स्वाहा कल्याण और स्वार्थवत सियासी लोगों की शक्ति और समृद्धि में इजाफा हुआ है, जो आज हर समझदार नागरिक मतदाता को स्वयं के निहित स्वार्थ छोड विचारणीय होना चाहिए। क्योंकि सेवा कल्याण की आड में सत्ता और हकों की लूट ऐसी बढती रही तो यह महान लोकतंत्र को श्राफ ही कहा जायेगा। जो ना तो मौजूद संघर्षरत पीढ़ी के हक में है और ना ही आने वाली पीढी के हक में। एक सच्चे और अच्छे लोकतंत्र की पहचान सत्ता सरकारों के सर्वकल्याणकारी कार्य और नागरिकों के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से होती है। मगर जब नागरिक अपने निहित स्वार्थ या छलपूर्ण सियासत के छल में आकर अपने भविष्य को दांव पर लगा देती है और सत्तायें नागरिकों की बैवसी और उनके भोलेपन का लाभ उठा सेवा कल्याण के मार्ग में स्वयं के स्वार्थपूर्ति को सर्वकल्याण सिद्ध करती है तो ऐसे तंत्र या लोक का कल्याण असंभव ही होता है। जिससे उस राज्य में समृद्धि तो होती है मगर अधिकांश जनमानस, पीडा, आभावग्रस्त जीवन जीने पर मजबूर होता है। काश इस सच को आम नागरिक स्वयं के छणिक स्वार्थ को छोड ठीक से समझ पाये और साम्राज्यवादी ताकतों को पहचान पाये तो आज के जीवन में उसकी सबसे बडी सिद्धता होगी।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
बैवस मजबूर आभावग्रस्त लोकतंत्र में स्वार्थवत लोगों की सत्ता लूट को सभ्य समाज भले ही भ्रष्टाचार करार दें और इस नाम का विलाप कर दुखती रग और कलेजे को ठण्डा कर लिया जाये। मगर लोकतंत्र में सेवा कल्याण विकास के नाम छल से छल्ली हुई आशा-आकांक्षायें आज भी चींख-चींख अपनी बैवसी का बखान करती नहीं थकती। जिस तरह से आज से 26 वर्ष पूर्व म.प्र. की पटवा सरकार 16 वर्ष पूर्व दिग्विजय सरकार और 1 वर्ष पूर्व शिवराज सरकार को गांव, गली के गरीबों ने वोट की ताकत से तख्ता पलट कर धूल चटाई वह समूचे म.प्र. में किसी से छिपा नहीं। फिर इन सरकारों के दल काॅग्रेस, भाजपा रहे हो या फिर सियासी दांव पैंच से यह सरकारें सत्ता में आने के बाद स्वयं सिद्ध रही हो। मगर आम गांव, गली, गरीब, बेरोजगारों की कौम को कुछ हासिल नहीं हो सका और ना ही म.प्र. के युवाओं को सम्मानित रोजगार मिल सका, ना ही वह उन संसाधनों के हक पाने लायक रहे जिनकी लूट सत्ता के संरक्षण में स्वार्थवत लोगों द्वारा बड़ी ही बेरहमी से विगत 26 वर्षो में की गई और आज भी विधि की आड़ में और सत्ता की हनक के आगे जारी है। यह समृद्ध म.प्र. का दुर्भाग्य कहा जायेगा कि समृद्ध, जीवन और सम्मानित रोजगार तथा नैसर्गिक सहज सुविधाओं के आभाव में पूरी दो पीढ़ियां इस आकांक्षा में स्वाहा हो गईं कि आज नहीं तो कल उनके बच्चे भी उच्च पदों पर आसीन होंगे, कहीं तो वह सत्ता के सहभागी बनेंगे, ना कुछ सही तो सम्मानित रोजगार सहज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और शुद्ध पेयजल तो प्राप्त कर सकेंगे। मगर ना तो इन 26 वर्षो में यह सत्तायें ऐसा कर सकी और ना ही स्वार्थवत सियासत के बीच ऐसा हो सका। मगर लोकतंत्र में जिस तरह से सत्ता में वंशवाद, सत्ता सियासवाद स्थापित है और चरण चुम्बन की संस्कृति स्वार्थवत हावी है उसे देखकर कहा जा सकता है कि एक सशक्त, समृद्ध, लोकतंत्र स्वार्थवत सियासत के आगे आज शैया पर निढाल पढा है, तो वहीं दूसरी ओर सर्वकल्याण के सिद्धान्त से दूर स्वाहा कल्याण और स्वार्थवत सियासी लोगों की शक्ति और समृद्धि में इजाफा हुआ है, जो आज हर समझदार नागरिक मतदाता को स्वयं के निहित स्वार्थ छोड विचारणीय होना चाहिए। क्योंकि सेवा कल्याण की आड में सत्ता और हकों की लूट ऐसी बढती रही तो यह महान लोकतंत्र को श्राफ ही कहा जायेगा। जो ना तो मौजूद संघर्षरत पीढ़ी के हक में है और ना ही आने वाली पीढी के हक में। एक सच्चे और अच्छे लोकतंत्र की पहचान सत्ता सरकारों के सर्वकल्याणकारी कार्य और नागरिकों के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से होती है। मगर जब नागरिक अपने निहित स्वार्थ या छलपूर्ण सियासत के छल में आकर अपने भविष्य को दांव पर लगा देती है और सत्तायें नागरिकों की बैवसी और उनके भोलेपन का लाभ उठा सेवा कल्याण के मार्ग में स्वयं के स्वार्थपूर्ति को सर्वकल्याण सिद्ध करती है तो ऐसे तंत्र या लोक का कल्याण असंभव ही होता है। जिससे उस राज्य में समृद्धि तो होती है मगर अधिकांश जनमानस, पीडा, आभावग्रस्त जीवन जीने पर मजबूर होता है। काश इस सच को आम नागरिक स्वयं के छणिक स्वार्थ को छोड ठीक से समझ पाये और साम्राज्यवादी ताकतों को पहचान पाये तो आज के जीवन में उसकी सबसे बडी सिद्धता होगी।
जय स्वराज
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