गर्वपूर्ण, निकम्मापन, निरलज्जता पूर्ण पुरूषार्थ, फिर भी शर्म नहीं गर्भ...........तीरंदाज
व्ही.एस.भुल्ले
भैया- इतने पर तो मैं समृद्ध, खुशहाल, महान बन जाऊंगा। अपरिपक्व म्हारा लोकतंत्र भले ही रहे। इस पशुवत जीवन के बावजूद कम से कम सम्राट नहीं तो महान तो कहलाऊंगा।
भैये- काला मुंह हो तेरा, तू कै अर्र-बर्र बक रिया शै कै थारे को मालूम कोणी म्हारी महान सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, शिक्षा जिसका आधार सिर्फ और सिर्फ त्याग तपस्या और अनगिनत कुर्बानियां रही है म्हारी महान विरासत इतिहास गवाह है म्हारी समृद्ध, खुशहाल, जीवन की। तने तो बावला शै थारे को मालूम कोणी म्हारे पूर्वजों ने अपना समूचा जीवन सर्वकल्याण सेवा, कत्र्तव्य निर्वहन जबावदेही के उच्च जीवन मूल्य सिद्धान्तों की खातिर जिया है पुरूषार्थ की पराकाष्ठा की है, शायद ही कोई सभ्यता, संस्कृति ऐसी रही हो, जो हमारी महान संपदा संस्कृति को छू पाये जो म्हारे पूर्वजों द्वारा सौंपी गई हमें हमारी महान विरासत है।
भैया- तो फिर सत्ता, सियासत, समाज, परिवार, व्यक्ति के बीच पतन की पराकाष्ठा क्यों ? जघन्य हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, नैतिक पतन की पराकाष्ठा क्यों ? आखिर क्यों उस महान भूभाग पर, ऐसे-ऐसे दुर्दान्त उदाहरण देखे जा रहे है। क्यों आज हमारी मातृ-शक्ति अपमानित होती है और अबोध युवाओं के बीच कु-कृत्य और समाज, परिवार, मानवता को कलंकित करने वाली प्रवृति पनपती है। भाया म्हारे नेता, नेत्रियों को जो भी कहे। मगर जो मिशाल अपनी कृतज्ञता के चलते समूचे मानव समाज के सामने है वह अनेक निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कृतज्ञता समझने काफी है। जो कभी न थके रूके, न ही कभी कृतज्ञता से समझौता किया, न कर रहे है। ऐसे में समूची मानवता को समझने वाली बात यह होना चाहिए कि अगर समृद्धि, खुशहाली के हमारे मार्ग, साधन उत्तम नहीं रहे तो निश्चित ही न तो उत्तम साध्य प्राप्त होगा और न ही जीवन की सार्थकता, सिद्धता प्राप्त होगी। अगर इस तरह के जघन्य कृत्य नहीं रोके गये तो पशुवत जीवन कहना भी एक कलंक ही कहा जायेगा।
भैये- मैं जाडू थारे को गर्व भी है और शर्म भी। मगर कै करें म्हारी तो निर्बलता ही म्हारे मुंह पर कालिख पोतने काफी है।
भैया- मैं समझ गिया थारा इसारा कि भांड की तरह चिल्लाने से कुछ न होने वाला शै, सो भाया अब मने ही ऐसा मार्ग बनाऊंगा जिसमें जीवन्त शिक्षा, खुशहालपूर्ण संस्कृति और संस्कारों का बोलबाला हो, पुरूषार्थ ऐसा कि हजारों वर्षो तक उसका बोलबाला हो।
भैया- इतने पर तो मैं समृद्ध, खुशहाल, महान बन जाऊंगा। अपरिपक्व म्हारा लोकतंत्र भले ही रहे। इस पशुवत जीवन के बावजूद कम से कम सम्राट नहीं तो महान तो कहलाऊंगा।भैये- काला मुंह हो तेरा, तू कै अर्र-बर्र बक रिया शै कै थारे को मालूम कोणी म्हारी महान सभ्यता, संस्कृति, संस्कार, शिक्षा जिसका आधार सिर्फ और सिर्फ त्याग तपस्या और अनगिनत कुर्बानियां रही है म्हारी महान विरासत इतिहास गवाह है म्हारी समृद्ध, खुशहाल, जीवन की। तने तो बावला शै थारे को मालूम कोणी म्हारे पूर्वजों ने अपना समूचा जीवन सर्वकल्याण सेवा, कत्र्तव्य निर्वहन जबावदेही के उच्च जीवन मूल्य सिद्धान्तों की खातिर जिया है पुरूषार्थ की पराकाष्ठा की है, शायद ही कोई सभ्यता, संस्कृति ऐसी रही हो, जो हमारी महान संपदा संस्कृति को छू पाये जो म्हारे पूर्वजों द्वारा सौंपी गई हमें हमारी महान विरासत है।
भैया- तो फिर सत्ता, सियासत, समाज, परिवार, व्यक्ति के बीच पतन की पराकाष्ठा क्यों ? जघन्य हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, नैतिक पतन की पराकाष्ठा क्यों ? आखिर क्यों उस महान भूभाग पर, ऐसे-ऐसे दुर्दान्त उदाहरण देखे जा रहे है। क्यों आज हमारी मातृ-शक्ति अपमानित होती है और अबोध युवाओं के बीच कु-कृत्य और समाज, परिवार, मानवता को कलंकित करने वाली प्रवृति पनपती है। भाया म्हारे नेता, नेत्रियों को जो भी कहे। मगर जो मिशाल अपनी कृतज्ञता के चलते समूचे मानव समाज के सामने है वह अनेक निष्ठा पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कृतज्ञता समझने काफी है। जो कभी न थके रूके, न ही कभी कृतज्ञता से समझौता किया, न कर रहे है। ऐसे में समूची मानवता को समझने वाली बात यह होना चाहिए कि अगर समृद्धि, खुशहाली के हमारे मार्ग, साधन उत्तम नहीं रहे तो निश्चित ही न तो उत्तम साध्य प्राप्त होगा और न ही जीवन की सार्थकता, सिद्धता प्राप्त होगी। अगर इस तरह के जघन्य कृत्य नहीं रोके गये तो पशुवत जीवन कहना भी एक कलंक ही कहा जायेगा।
भैये- मैं जाडू थारे को गर्व भी है और शर्म भी। मगर कै करें म्हारी तो निर्बलता ही म्हारे मुंह पर कालिख पोतने काफी है।
भैया- मैं समझ गिया थारा इसारा कि भांड की तरह चिल्लाने से कुछ न होने वाला शै, सो भाया अब मने ही ऐसा मार्ग बनाऊंगा जिसमें जीवन्त शिक्षा, खुशहालपूर्ण संस्कृति और संस्कारों का बोलबाला हो, पुरूषार्थ ऐसा कि हजारों वर्षो तक उसका बोलबाला हो।
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