जनसेवा, सत्याग्रह से लेकर सडक तक जीवन मूल्य सिद्धान्त पिछले दरवाजे से सत्तारूढ सियासत की हनक से हलाकान सवाल बनेगा नया दल या दल में दिखेगा समाधान

वीरेन्द्र भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है समुद्र में सुनामी से पहले की शान्ति का अहसास किसी को न हो, मगर सुनामी के साथ तबाही के परिणाम किसी से नहीं छिपे। फिर वह सुनामी, सडक, समुद्र की हो या फिर सियासत की। मगर यहां हम चर्चा सियासी सुनामी की इसलिए भी कर रहे है क्योंकि प्रकृति के विधान विरूद्ध पिछले दरवाजे से सत्तारूढ सियासत की हनक से कई सियासी सवाल हलाकान है और जनसेवा, सत्याग्रह से लेकर सडक तक जीवन मूल्य सिद्धान्त, निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन परेशान है। जो आज की षडयंत्रपूर्ण सियासत का नंगा सच है। अब इस सच से कितने सियासी लोग सहमत असहमत है यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। 
मगर अन्दर खानों की खबर यह है कि 30 दिसम्बर से पूर्व सियासी गलियारों में एक ऐसा तूफान उठने वाला है जो सियासी समुद्र में सुनामी लाने काफी है। संभावित सुनामी के मंथन में नया दल बनेगा या फिर दलों का स्वरूप और सत्ता स्वरूप तय होगा यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। मगर म.प्र. की बलबती होती षडयंत्रपूर्ण सियासत साथ ही पिछले दरवाजे से सत्ता सियासत हथियाने वालो की अग्नि परीक्षा है। क्योंकि जिस तरह से काॅग्रेस ही नहीं भाजपा की सियासी तलहटी में उथल-पुथल मची है वह दोनों ही दल के आलाकमानों को डराने वाली होना चाहिए। अगर राजनैतिक पण्डितों की माने तो इस सियासी सुनामी में किसका अस्तित्व बचेगा और आगे का मार्ग कौन तय करेगा फिलहाल कहना मुश्किल, क्योंकि जिस तरह से दोनों ही दलों में सेवा कल्याण, सत्याग्रह, जीवन मूल्य सिद्धान्तों की सियासत करने वाले फिलहाल हासिये पर है। फिर चाहे वह शिव हो सिंधिया, यह बात आज हर सियासतदार को समझने वाली होना चाहिए।

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