संस्कारों की होली और शर्मनाक सियासत सर्वोच्चतम संस्कारों की विरासत है शिवपुरी माँ बेटे के श्रद्धा, भक्ति, प्रेम की मिशाल 100 वर्ष पुराने संस्कारिक सर्वसुविधा युक्त स्वच्छ शहर की बर्बाद विरासत
वीरेन्द्र शर्मा
हो सकता है कि मेरी अदनी-सी समझ सोच लोगों को चापलूसी, गुलामी प्रतीत हो, जिसे वह नकारे या स्वीकारे, मगर मेरी अभिव्यक्ति मुझे अवश्य धिक्कारती है। मेरा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य, निर्वहन जो एक ऐसी स्वार्थवत, असंस्कारी, अहंकारी एवं तथा तथाकथित संस्कृति का चाहे अनचाहे रूप में भाग हो सकती है। क्योंकि मैं भी आज उस 100 वर्ष पुराने संस्कारिक, स्वच्छंद, सर्वसुविधायुक्त शहर सिंधिया स्टेट की पूर्व ग्रीष्मकालीन राजधानी का नागरिक हूं।
जिस शहर में 100 वर्ष पूर्व रेल सड़क, बिजली, पानी, सीवर पार्क, तालाब, झील, झरने, घने जंगल, वन्य प्राणी, वृहत भवन, होस्टल, प्राचीन भव्य मंदिर, खेल मैदान, सांस्कृतिक भवन, चैड़ी-चैडी सडक, सुन्दर चैराहे तथा तालाबों की तलहटी में आम, अमरूद के बाग और पशुधन की समृद्धि सहित श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, सुख, शान्ति, समृद्धि के संस्कारिक सरोकार थे। जो किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज के सर्वोच्चतम संस्कारिक शिखर कहे जा सकते है। माँ के प्रति बेटे की श्रद्धा, प्रेम और समर्पणपूर्ण संस्कार यहां की आवो-हवा के भाग थे जिसे एक शासक ने सृजन में जीवन, निर्वहन के दौरान निष्ठापूर्ण ढंग से स्थापित किये। मगर सियासी स्वार्थवत संस्कारों के चलते इस शहर के सामाजिक आर्थिक सरोकार, संस्कार, निस्तानाबूत होत चले गये जो आज किसी से छिपे नहीं। शहर की आवो-हवा उसकी सुन्दरता, संस्कारों का आज जो स्वार्थवत, सियासी संस्कृति, संस्कारों के चलते जो विनाश हुआ सो हुआ। मगर कुछ वर्ष पूर्व एक सर्वाधिक शर्मनाक पाप हमारी संस्कारिक के साथ विरासत यह हुआ कि जिस शासक ने सामाजिक संस्कारिक, जीवन, मूल्य स्वयं के जीवन में पालन कर स्थापित किये। चाहे वह 100 वर्ष पूर्व शासक के रूप में आमजन की सेवा, उनका सर्वांगीण विकास हो या घने जंगल, पथरीले पठारी क्षेत्र शिवपुरी में समृद्ध जीवन के लिए गांव, शहरों में तालाबों की श्रृंखला के साथ बांध निर्माण हो। जाधव सागर से लेकर सांख सागर और माधौ लेख से होता हुआ खेतों तक पहुंचने वाले जल का आमजन की समृद्धि में उपयोग हो। जिसमें सुख, शान्ति, समृद्धि के साथ श्रद्धा, भक्ति, प्रेम का समावेश है। क्योंकि जाधव सागर का नाम उस शासक ने अपने नाना और सांख सागर का नाम अपनी माँ तथा माधौलेख का नाम स्वयं के इसलिए रखा जाना आने वाली पीढियों में श्रद्धापूर्ण भाव से प्रेम और सामाजिक सरोकार सहित उच्चतम संस्कारों की समझ बढ सके। जो शासक राजा रहते नंगे पैर अपने माँ की प्रतिमा को रथ पर बिठा किलोमीटरों रथ को खींच हर वर्ष नगर भ्रमण करा सांस्कृतिक आयोजन करता रहा हो अपनी पूज्यनीय माता के प्रति श्रद्धा स्नेह बस स्वयं के समर्पण को साबित करने पारिवारिक और राजशी परंपरा से इतर अपनी माँ की प्रतिमा के सामने मर्ण उपरान्त स्वयं की प्रतिमा स्थातिप करने की इच्छा व्यक्त की हो। आज शिवपुरी स्थित छत्री इसका जीता-जागता प्रमाण है कि श्रद्धा, भक्ति, प्रेम जनता ही नहीं माँ के प्रतीत बेटे का त्याग क्या होना चाहिए यह प्रमाणित है। जो शासक अपने नागरिकों से सहज सीधा संवाद स्थापित करने और लोगों को सुनने समझने एक सहज व्यक्ति की भांति शहर के बीचों-बीच मौजूद मंदिर के कुंए पर बगैर दरवार के सहज उपलब्ध हो जाता हो। एक शासक की अनूठी मिशाल जन समर्पण के प्रति ही कही जायेगी। अगर पुराने लोगों की माने तो जिस माधौ चैक पर कभी उनकी मूर्ति स्थापित थी वह स्थान वहीं था जहां वह आम नागरिक के बीच अपनी जनता के साथ संवाद स्थापित कर सीधा संपर्क बनाये रखते थे। मगर दुर्भाग्य कि ऐसा महापुरूष राजा तो 100 वर्ष पूर्व ही इस दुनिया को विधा कह चुका। मगर उनकी बैठक वाले चैराहे से आज नदारद उनकी मूर्ति बदले संस्कार, स्वार्थवत सियासत, संस्कृति का आभास अवश्य कराती है। जो मेरे जैसे अदने से व्यक्ति के लिए शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी। जो हमारी विरासत के प्रतीत कै.वासी श्रीमंत माधौ महाराज की मूर्ति को आज तक माधौ चैक पर स्थापित नहीं करवा पाये। देखना होगा कि हमारे वह सर्वोच्चतम संस्कार इस शहर में स्थापित रहते है या हमेशा स्वार्थवत सियासत और संस्कृति हावी रहने वाली है।
हो सकता है कि मेरी अदनी-सी समझ सोच लोगों को चापलूसी, गुलामी प्रतीत हो, जिसे वह नकारे या स्वीकारे, मगर मेरी अभिव्यक्ति मुझे अवश्य धिक्कारती है। मेरा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य, निर्वहन जो एक ऐसी स्वार्थवत, असंस्कारी, अहंकारी एवं तथा तथाकथित संस्कृति का चाहे अनचाहे रूप में भाग हो सकती है। क्योंकि मैं भी आज उस 100 वर्ष पुराने संस्कारिक, स्वच्छंद, सर्वसुविधायुक्त शहर सिंधिया स्टेट की पूर्व ग्रीष्मकालीन राजधानी का नागरिक हूं।जिस शहर में 100 वर्ष पूर्व रेल सड़क, बिजली, पानी, सीवर पार्क, तालाब, झील, झरने, घने जंगल, वन्य प्राणी, वृहत भवन, होस्टल, प्राचीन भव्य मंदिर, खेल मैदान, सांस्कृतिक भवन, चैड़ी-चैडी सडक, सुन्दर चैराहे तथा तालाबों की तलहटी में आम, अमरूद के बाग और पशुधन की समृद्धि सहित श्रद्धा, भक्ति, प्रेम, सुख, शान्ति, समृद्धि के संस्कारिक सरोकार थे। जो किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज के सर्वोच्चतम संस्कारिक शिखर कहे जा सकते है। माँ के प्रति बेटे की श्रद्धा, प्रेम और समर्पणपूर्ण संस्कार यहां की आवो-हवा के भाग थे जिसे एक शासक ने सृजन में जीवन, निर्वहन के दौरान निष्ठापूर्ण ढंग से स्थापित किये। मगर सियासी स्वार्थवत संस्कारों के चलते इस शहर के सामाजिक आर्थिक सरोकार, संस्कार, निस्तानाबूत होत चले गये जो आज किसी से छिपे नहीं। शहर की आवो-हवा उसकी सुन्दरता, संस्कारों का आज जो स्वार्थवत, सियासी संस्कृति, संस्कारों के चलते जो विनाश हुआ सो हुआ। मगर कुछ वर्ष पूर्व एक सर्वाधिक शर्मनाक पाप हमारी संस्कारिक के साथ विरासत यह हुआ कि जिस शासक ने सामाजिक संस्कारिक, जीवन, मूल्य स्वयं के जीवन में पालन कर स्थापित किये। चाहे वह 100 वर्ष पूर्व शासक के रूप में आमजन की सेवा, उनका सर्वांगीण विकास हो या घने जंगल, पथरीले पठारी क्षेत्र शिवपुरी में समृद्ध जीवन के लिए गांव, शहरों में तालाबों की श्रृंखला के साथ बांध निर्माण हो। जाधव सागर से लेकर सांख सागर और माधौ लेख से होता हुआ खेतों तक पहुंचने वाले जल का आमजन की समृद्धि में उपयोग हो। जिसमें सुख, शान्ति, समृद्धि के साथ श्रद्धा, भक्ति, प्रेम का समावेश है। क्योंकि जाधव सागर का नाम उस शासक ने अपने नाना और सांख सागर का नाम अपनी माँ तथा माधौलेख का नाम स्वयं के इसलिए रखा जाना आने वाली पीढियों में श्रद्धापूर्ण भाव से प्रेम और सामाजिक सरोकार सहित उच्चतम संस्कारों की समझ बढ सके। जो शासक राजा रहते नंगे पैर अपने माँ की प्रतिमा को रथ पर बिठा किलोमीटरों रथ को खींच हर वर्ष नगर भ्रमण करा सांस्कृतिक आयोजन करता रहा हो अपनी पूज्यनीय माता के प्रति श्रद्धा स्नेह बस स्वयं के समर्पण को साबित करने पारिवारिक और राजशी परंपरा से इतर अपनी माँ की प्रतिमा के सामने मर्ण उपरान्त स्वयं की प्रतिमा स्थातिप करने की इच्छा व्यक्त की हो। आज शिवपुरी स्थित छत्री इसका जीता-जागता प्रमाण है कि श्रद्धा, भक्ति, प्रेम जनता ही नहीं माँ के प्रतीत बेटे का त्याग क्या होना चाहिए यह प्रमाणित है। जो शासक अपने नागरिकों से सहज सीधा संवाद स्थापित करने और लोगों को सुनने समझने एक सहज व्यक्ति की भांति शहर के बीचों-बीच मौजूद मंदिर के कुंए पर बगैर दरवार के सहज उपलब्ध हो जाता हो। एक शासक की अनूठी मिशाल जन समर्पण के प्रति ही कही जायेगी। अगर पुराने लोगों की माने तो जिस माधौ चैक पर कभी उनकी मूर्ति स्थापित थी वह स्थान वहीं था जहां वह आम नागरिक के बीच अपनी जनता के साथ संवाद स्थापित कर सीधा संपर्क बनाये रखते थे। मगर दुर्भाग्य कि ऐसा महापुरूष राजा तो 100 वर्ष पूर्व ही इस दुनिया को विधा कह चुका। मगर उनकी बैठक वाले चैराहे से आज नदारद उनकी मूर्ति बदले संस्कार, स्वार्थवत सियासत, संस्कृति का आभास अवश्य कराती है। जो मेरे जैसे अदने से व्यक्ति के लिए शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी। जो हमारी विरासत के प्रतीत कै.वासी श्रीमंत माधौ महाराज की मूर्ति को आज तक माधौ चैक पर स्थापित नहीं करवा पाये। देखना होगा कि हमारे वह सर्वोच्चतम संस्कार इस शहर में स्थापित रहते है या हमेशा स्वार्थवत सियासत और संस्कृति हावी रहने वाली है।
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