म.प्र. में लोकतांत्रिक पुलिसिंग की मिशाल बनता पुलिस महकमा सिस्टम में पारदर्शी समाधान अहम 26 जनवरी से होगी एफआईआर की वीडियों रिकाॅर्डिंग

वीरेन्द्र भुल्ले
म.प्र.। आम लोगों के बीच मृदु, सौम्य, हसमुख स्वभाव की हनक के बीच सिस्टम को आम समन्वय के साथ जनसेवा में सिद्ध करने वाले 2010 बैच के पुलिस अधिकारी की कार्यशैली में अनुशासन तथा समस्या का पारदर्शी समाधान का हुनर यूं तो उन्हें उनके पारिवारिक संस्कारों से विरासत में मिला है। मगर सिस्टम की पेचीजिदियों के बीच अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को उन्होंने अपने वरिष्ठ अफसरों से सीखा है। सीहोर, भोपाल के बाद तीसरी मर्तवा पुलिस अधीक्षक के रूप में वह म.प्र. में र्दुदांत दस्यु प्रभावित रहे शिवपुरी जिले में 6 माह पूर्व ही उन्हें पदस्थ किया गया है। जहां उनकी पदस्थापना के साथ ही एक ऐसे जिले के पुलिस अधीक्षक के रूप में कत्र्तव्य निर्वहन का मौका मिला जो विगत 40-50 वर्षो से दस्यु समस्या से जूझता रहा है। तो वहीं शराब, रसद, रेत, खनन, माफिया की धमक भी इस जिले में कुछ कम नहीं। इससे पहले कि वह म.प्र. के शिवपुरी जिले की आवोहवा से पूर्णताः परिचित हो पाते कि धारा 370, आयोध्या प्रकरण सीईएए जैसे संवेदनशील मुद्दे भी चुनौती बने रहे। मगर सबसे चुनौती पूर्ण कार्य पुलिस अधीक्षक के रूप में राजेश सिंह चन्देल के सामने लगभग 70 हजार आवदेकों की सैनिक भर्ती के शान्तिपूर्ण हो जाने को लेकर थी। जिसे जिला प्रशासन एवं पुलिस महकमा सहित समन्वय के माध्यम से शान्तिपूर्वक तरीके से समाधान किया गया। 
ज्ञात हो कि इससे पूर्व हुई सैनिक भर्ती रैलियों में जिस तरह से युवाओं द्वारा आते जाते बबाल काटा जाता था वह किसी से छिपा नहीं। मगर कितने सारे संवेदनशील मुद्दों पर शान्तिपूर्ण व्यवस्था बनाया रखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक पुलिसिंग की मिशाल ही माना जायेगा। जब इस संबंध में म.प्र. शिवपुरी के पुलिस अधीक्षक राजेश सिंह चन्देल से पूछा गया कि इतने संवेदनशील निर्णयों के बावजूद त्यौहारों पर होने वाली रैलियां तथा सैनिक भर्ती रैली जैसे चुनौतीपूर्ण कार्यो के बीच शान्तिपूर्ण ढंग से कानून का राज कैसे संभव हुआ। इस पर सौम्य स्वभाव हसमुख राजेश सिंह का कहना था कि अगर हरपल कुछ नई सीख, समझ तथा समन्वय के साथ संवेदनशील तरीके से पारदर्शी निष्ठापूर्ण कत्र्तव्यों का निर्वहन समाधान की सोच के साथ हो तो कार्य कितना भी चुनौतीपूर्ण क्यों ना हो, सफलता अवश्य मिलती है। इसलिए हम 26 जनवरी से हर थाने में लिखी जाने वाली एफआईआर की वीडियों रिकाॅर्डिंग की शुरूआत की जा रही है। जिससे एक विश्वसनीय और पारदर्शी व्यवस्था को बल मिल सके और लोगों को उनकी समस्याओं का सार्थक समाधान मिल सके। कहते है किसी भी सिस्टम में चुनौती या समस्याओं का अन्त कभी नहीं होता। मगर समाधान के रास्ते अगर स्पष्ट पारदर्शी और न्याय संगतपूर्ण हो तो उनही सराहना किसी भी सिस्टम या सोसायटी में अवश्य की जाती है। देखना होगा कि चुनौतीपूर्ण माहौल के बीच अस्तित्व बनाती लोकतांत्रिक पुलिसिंग की यह मिशाल आगे भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में कितनी कारगार रह पाती है। 

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