कुतर्क, कलंक से जूझती निष्ठापूर्ण कृतज्ञता सियासी कालिक से हलाकान लोकतंत्र सृजन में स्वाहा होते जन सरोकार
व्ही.एस.भुल्ले
एक लम्बे अंतराल के बाद आज जब निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, सृजन में जनसरोकारों को लेकर हो रहा ऐसे में जो सियासी तौर पर आजकल सडकों पर चल रहा है। ऐसे में कुतर्कपूर्ण, कलंकित सियासत से हलाकान विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र की कृतज्ञता कुतर्क कलंक से हैरान-परेशान है। जिस तरह से संविधान की रक्षा के नाम नामी ग्रामी शिक्षण, संस्थानों से लेकर सडक तक संवैधानिक सर्वोच्च संस्थाओं के निर्णय पर कोहराम मचा है। यह इस राष्ट्र के विधा, विद्ववान, सियासत, सत्ता, समाज और सृजन में आस्था रखने वाले सज्जन पुरूषोें के लिए विचारणीय ही नहीं समझने वाली बात होना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1984 से लेकर आज तक हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था और जन सरोकार, कैसी सियासत, संस्कृति, सत्ताओं के बीच फला फूला है। आज जब सृजन में जन सरोकारों की बात हो रही है तो ऐसे में संस्थाओं से लेकर सडक तक सियासी कोहराम आखिर क्यों ? बहरहाल जो भी हो इतिहास गवाह है जिस भी सत्ता, सभा, परिषद, जनपद ने सृजन में जन-जीवों के सरोकारों की खातिर अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन किया है वह इतिहास में आज भी जिन्दा है और हजारों सैकडों वर्ष बाद भी उनकी निष्ठापूर्ण न्यायप्रिय कृतज्ञता के लिए उन्हें जाना जाता है और उनके निर्णयो को सराहा ही नहीं स्वीकार्य भी किया जाता है। इसलिए राज सत्ता का सबसे बडा धर्म उसके लिए उसका राजधर्म होता है और उसका निष्ठापूर्ण निर्वहन उसकी कृतज्ञता फिर सियासी कुतर्क कलंक का पैमाना जो भी हो। मगर ऐसी कृतज्ञता के परिणाम पुरूषार्थी ही नहीं सक्षम, सफल भी सिद्ध होते है। मौजूद सत्ता, संगठन, संस्थाओं, समाज, परिवार, व्यक्ति, प्रियजन, सज्जनों के लिए आज सबसे बडी समझने वाली यहीं बात होना चाहिए। फिर धर्म, जाति, क्षेत्र, सियासत, दल, व्यक्ति जो भी हो।
एक लम्बे अंतराल के बाद आज जब निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन, सृजन में जनसरोकारों को लेकर हो रहा ऐसे में जो सियासी तौर पर आजकल सडकों पर चल रहा है। ऐसे में कुतर्कपूर्ण, कलंकित सियासत से हलाकान विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र की कृतज्ञता कुतर्क कलंक से हैरान-परेशान है। जिस तरह से संविधान की रक्षा के नाम नामी ग्रामी शिक्षण, संस्थानों से लेकर सडक तक संवैधानिक सर्वोच्च संस्थाओं के निर्णय पर कोहराम मचा है। यह इस राष्ट्र के विधा, विद्ववान, सियासत, सत्ता, समाज और सृजन में आस्था रखने वाले सज्जन पुरूषोें के लिए विचारणीय ही नहीं समझने वाली बात होना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 1984 से लेकर आज तक हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था और जन सरोकार, कैसी सियासत, संस्कृति, सत्ताओं के बीच फला फूला है। आज जब सृजन में जन सरोकारों की बात हो रही है तो ऐसे में संस्थाओं से लेकर सडक तक सियासी कोहराम आखिर क्यों ? बहरहाल जो भी हो इतिहास गवाह है जिस भी सत्ता, सभा, परिषद, जनपद ने सृजन में जन-जीवों के सरोकारों की खातिर अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन किया है वह इतिहास में आज भी जिन्दा है और हजारों सैकडों वर्ष बाद भी उनकी निष्ठापूर्ण न्यायप्रिय कृतज्ञता के लिए उन्हें जाना जाता है और उनके निर्णयो को सराहा ही नहीं स्वीकार्य भी किया जाता है। इसलिए राज सत्ता का सबसे बडा धर्म उसके लिए उसका राजधर्म होता है और उसका निष्ठापूर्ण निर्वहन उसकी कृतज्ञता फिर सियासी कुतर्क कलंक का पैमाना जो भी हो। मगर ऐसी कृतज्ञता के परिणाम पुरूषार्थी ही नहीं सक्षम, सफल भी सिद्ध होते है। मौजूद सत्ता, संगठन, संस्थाओं, समाज, परिवार, व्यक्ति, प्रियजन, सज्जनों के लिए आज सबसे बडी समझने वाली यहीं बात होना चाहिए। फिर धर्म, जाति, क्षेत्र, सियासत, दल, व्यक्ति जो भी हो।

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