वे विचार विरोध की व्यग्रता खतरनाक
व्ही.एस.भुल्ले
मौजूद भूभाग पर, राष्ट्र कोई सिर्फ किसी भी भूभाग का टुकड़ा मात्र भर नहीं, उसकी समग्रता, पहचान उसकी संस्कृति, संस्कार व त्याग तपस्या से स्थापित जीवन, मूल्य और सिद्धान्तों की विरासत होती है। जिसकी रक्षा करना उसका सम्मान करना हर उस नागरिक का धर्म होता है जिसकी सेवा कल्याण विकास का जिम्मा उन सत्ताओं का धर्म होता है जिन्हें विधि विधान अनुरूप समस्त अधिकार व्यवस्था संचालित करने के लिए प्राप्त होते है। जिन्हें अंगीकार कर हर नागरिक, सृजन में अपने जीवन निर्वहन के साथ अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते है। मगर जब बगैर विचार सिर्फ और सिर्फ स्वयं के स्वार्थ या सियासत चमकाने राष्ट्र-हित में लिये जाने वाले निर्णयों पर अभिव्यक्ति के नाम विरोध होता है वह सराहनीय नहीं कहा जा सकता, ना ही ऐसे विरोध को सर्वमान्य समर्थन हासिल हो पायेगा। खासकर तब की स्थिति में जब राष्ट्र-हित में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन हो रहा हो। ऐसे में ऐसे विरोध पर ना तो राष्ट्र कभी गर्व करेगा और ना ही उस राष्ट्र का नागरिक स्वयं को गौरान्वित कर सकेगा।
काश इस सच और समय की नजाकत को वह सियासी दल, समाज, परिवार, व्यक्ति समझ पाये जो आज बगैर विचार किये विरोध के समर्थन में अपनी स्वार्थवत सियासत चमका स्वयं के सुनहरे भविष्य को फलीभूत होते देखना चाहते है। उन्हें समझना होगा कि 1984 से लेकर 2014 तक की सत्ताओं का काल खण्ड कैसा रहा उनकी क्या उपलब्धियां रही, उनकी कार्यप्रणाली कैसी रही। इन सभी की समीक्षा करनी चाहिए और बेलगाम सियासत को सत्य को समझ अर्थ की कल्पना करनी चाहिए। बरना सत्ता, सियासत का क्या जब-जब वह सिद्ध रही सर्व स्वीकार्य हुई तो उन्हें मुख कंठ से सराहा गया और जब-जब स्वार्थ में डूब सियासत, समाज, सत्ता का उपयोग स्स्वार्थ के लिए हुआ उन्हें हमेशा नकारा गया। फिर तंत्र व्यवस्था जो भी रही हो, चाहे वह राजतंत्र रहा हो, या लोकतंत्र इतिहास में वहीं जिन्दा रहते है। जिनका पुरूषार्थ सृजन में सर्वकल्याण के लिए हुआ या जिनका पुरूषार्थ स्वयं के लिए सार्थक हुआ उसे इतिहास ने हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिया। अब विचार उन महान नागरिक और मानवों को करना है जो अपने आने वाली पीढियों का भविष्य उज्जवल व सुनहरा देखना चाहते है और जिस राष्ट्र ने उन्हें पहचान दी उसे गौरान्वित होते देखना चाहते है।
जय स्वराज
मौजूद भूभाग पर, राष्ट्र कोई सिर्फ किसी भी भूभाग का टुकड़ा मात्र भर नहीं, उसकी समग्रता, पहचान उसकी संस्कृति, संस्कार व त्याग तपस्या से स्थापित जीवन, मूल्य और सिद्धान्तों की विरासत होती है। जिसकी रक्षा करना उसका सम्मान करना हर उस नागरिक का धर्म होता है जिसकी सेवा कल्याण विकास का जिम्मा उन सत्ताओं का धर्म होता है जिन्हें विधि विधान अनुरूप समस्त अधिकार व्यवस्था संचालित करने के लिए प्राप्त होते है। जिन्हें अंगीकार कर हर नागरिक, सृजन में अपने जीवन निर्वहन के साथ अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते है। मगर जब बगैर विचार सिर्फ और सिर्फ स्वयं के स्वार्थ या सियासत चमकाने राष्ट्र-हित में लिये जाने वाले निर्णयों पर अभिव्यक्ति के नाम विरोध होता है वह सराहनीय नहीं कहा जा सकता, ना ही ऐसे विरोध को सर्वमान्य समर्थन हासिल हो पायेगा। खासकर तब की स्थिति में जब राष्ट्र-हित में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन हो रहा हो। ऐसे में ऐसे विरोध पर ना तो राष्ट्र कभी गर्व करेगा और ना ही उस राष्ट्र का नागरिक स्वयं को गौरान्वित कर सकेगा। काश इस सच और समय की नजाकत को वह सियासी दल, समाज, परिवार, व्यक्ति समझ पाये जो आज बगैर विचार किये विरोध के समर्थन में अपनी स्वार्थवत सियासत चमका स्वयं के सुनहरे भविष्य को फलीभूत होते देखना चाहते है। उन्हें समझना होगा कि 1984 से लेकर 2014 तक की सत्ताओं का काल खण्ड कैसा रहा उनकी क्या उपलब्धियां रही, उनकी कार्यप्रणाली कैसी रही। इन सभी की समीक्षा करनी चाहिए और बेलगाम सियासत को सत्य को समझ अर्थ की कल्पना करनी चाहिए। बरना सत्ता, सियासत का क्या जब-जब वह सिद्ध रही सर्व स्वीकार्य हुई तो उन्हें मुख कंठ से सराहा गया और जब-जब स्वार्थ में डूब सियासत, समाज, सत्ता का उपयोग स्स्वार्थ के लिए हुआ उन्हें हमेशा नकारा गया। फिर तंत्र व्यवस्था जो भी रही हो, चाहे वह राजतंत्र रहा हो, या लोकतंत्र इतिहास में वहीं जिन्दा रहते है। जिनका पुरूषार्थ सृजन में सर्वकल्याण के लिए हुआ या जिनका पुरूषार्थ स्वयं के लिए सार्थक हुआ उसे इतिहास ने हमेशा-हमेशा के लिए दफन कर दिया। अब विचार उन महान नागरिक और मानवों को करना है जो अपने आने वाली पीढियों का भविष्य उज्जवल व सुनहरा देखना चाहते है और जिस राष्ट्र ने उन्हें पहचान दी उसे गौरान्वित होते देखना चाहते है।
जय स्वराज
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