वे लाइन हुई आॅनलाईन सेवा

व्ही.एस.भुल्ले
म.प्र.। कहते है भोले-भाले बैवस, पीडित, वंचित, आभावग्रस्त लोगों के बीच जो हो जाये सो कम। मगर जिन आशा-आकांक्षाओं की पूर्ति और सुनहरे भविष्य की खातिर अपने हाड-तोड पसीने की कमाई लुटा जिन लोगों पर विश्वास व्यक्त किया उन्होंने विकास सेवा कल्याण को सहज करने के बजाये हाईटेक करने गरीबों का पैसा वेभाव लुटा सारी सेवा कल्याण ही आॅनलाईन कर दी। जो आजकल ओंदें मुंह वेलाईन पडी है। जो काम बगैर लाईन के ही घंटे भर में निवट जाता था आज वहीं काम होने में 7-7, 8-8 दिन गुजर जाते है। मगर समाधान संभव नहीं हो पाता। अगर सेवा भावी मूडधन्य सेवकों की बात करें तो जिस तरह से हाईटेक सेवा उपलब्ध कराने बगैर 24 घंटे बिजली, इन्टरनेट की उपलब्धता जांचे। सेवा कल्याण की संस्थाओं में बाढ आई उसने आज आम नागरिकों को बेहाल कर रखा है। जो बंैक जिन उपभोक्ताओं की जमा सावदी से करोडो रूपये कमा अपने कर्मचारियों को हाईटेक सुविधा, वेतन, भत्ते मुहैया कराते है आज उन बैंकों में आम उपभोक्ताओं को दुदकार कर जिस तरह से अपमानित किया जाता है और आईपीसी की धारा का डर दिखा उसे शान्त कर कर दिया जाता है वह किसी से छिपा नहीं। शहर के शहर में आॅनलाईन काॅर बैंकिंग से जुडे बैंकों में पांच-पांच, छः-छः का दिन चैकों का क्लीयर ना होना इस बात का प्रमाण है कि किस तरह आम नागरिक की आशा-आकांक्षाओं का उसी धन पर अपना घर चलाने वाली संस्थायें दीवाला निकालने पर तुली है। इसे बखूबी समझा जा सकता है। आॅनलाईन की आड में स्वयं के निकम्मेपन पर गर्व करती संस्थाओं का यथार्थ सच आज यही है कि सर्ववर बाबा के फैल होने की आड में आॅनलाईन संस्थाआंे में निकम्मापन खूब फल फूल रहा है। जो किसी भी सेवाभावी संस्था के लिए शर्मनाक और सोचनीय होना चाहिए।

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