सत्याग्रह को कमजोर करते, सियासी शागिर्द सफलता में अंक मजबूरी हो सकते हैं, मगर समाधान नही स्वयं को सिद्ध करने संपदाओं के सामने बड़ी चुनौती महत्वपूर्ण विभागों के बावजूद, प्रदर्शन शून्य परिवहन, राजस्व, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला बाल विकास, रसद, राशन विभाग के निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन पर सवाल
वीरेन्द्र शर्मा
कहते हैं सत्य के लिए आग्रह ना तो कभी कमजोर हो सकता है और ना ही उसका यथार्थ ओझल। मगर जब किसी भी नेतृत्व के सियासी शागिर्द स्वार्थवत हो और निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन में स्वयं को अक्षम पाते हो, ऐसे में सत्य के लिये सेवा के लिये किये जाने वाला आग्रह स्वतः ही शून्य हो जाता है।
मगर सत्ता की हनक में म.प्र. में सबकुछ चल रहा है। देखा जाये तो आमजन या जन सरोकारों से सीधे जुड़े अहम विभाग, राजस्व, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला बाल विकास, खाद्य, रसद, राशन का विगत 1 वर्ष में एक भी सार्थक, सफल, सेवाभावी प्रयास नहीं हुआ। जिसे निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के साथ सेवाभावी कल्याणकारी या सियासी कहा जा सके। इससे इतर एक वर्ष में ऐसे अहम विभागों के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को दर्दनाक ही कहा जाएगा। जो मध्यप्रदेश की सत्ता का आज यथार्थ भी है और भविष्य भी। काश सेवा कल्याण जनसरोकारों के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा पूर्ण कर्तव्य निर्वहन करने वाले अपने उस सेवाभावी सत्याग्राही के सेवा को सार्वजनिक या सियासी जीवन में समझ पाए तो उनके लिए यहीं सच्ची सार्थकता सेवा और जनकल्याण होगा जिसके लिए उनका नेतृत्व ठंड, गर्मी, बारिस की परवाह किये बगैर विगत 15 वर्षो से समूचे म.प्र. में संघर्षरत है। देखना होगा कि स्वयं सिद्ध सत्याग्राही की सीख से उनके सियासी शागिर्द सेवा कल्याण के क्षेत्र में कितनी सीख ले पाते है।
कहते हैं सत्य के लिए आग्रह ना तो कभी कमजोर हो सकता है और ना ही उसका यथार्थ ओझल। मगर जब किसी भी नेतृत्व के सियासी शागिर्द स्वार्थवत हो और निष्ठापूर्ण कर्तव्य निर्वहन में स्वयं को अक्षम पाते हो, ऐसे में सत्य के लिये सेवा के लिये किये जाने वाला आग्रह स्वतः ही शून्य हो जाता है।मगर सत्ता की हनक में म.प्र. में सबकुछ चल रहा है। देखा जाये तो आमजन या जन सरोकारों से सीधे जुड़े अहम विभाग, राजस्व, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला बाल विकास, खाद्य, रसद, राशन का विगत 1 वर्ष में एक भी सार्थक, सफल, सेवाभावी प्रयास नहीं हुआ। जिसे निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के साथ सेवाभावी कल्याणकारी या सियासी कहा जा सके। इससे इतर एक वर्ष में ऐसे अहम विभागों के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को दर्दनाक ही कहा जाएगा। जो मध्यप्रदेश की सत्ता का आज यथार्थ भी है और भविष्य भी। काश सेवा कल्याण जनसरोकारों के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा पूर्ण कर्तव्य निर्वहन करने वाले अपने उस सेवाभावी सत्याग्राही के सेवा को सार्वजनिक या सियासी जीवन में समझ पाए तो उनके लिए यहीं सच्ची सार्थकता सेवा और जनकल्याण होगा जिसके लिए उनका नेतृत्व ठंड, गर्मी, बारिस की परवाह किये बगैर विगत 15 वर्षो से समूचे म.प्र. में संघर्षरत है। देखना होगा कि स्वयं सिद्ध सत्याग्राही की सीख से उनके सियासी शागिर्द सेवा कल्याण के क्षेत्र में कितनी सीख ले पाते है।
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