मनमानी पर उतारू आजादी देर रात तक, दम से फूटते धमाके-फटाखे तथा दिल-दरबाजे, खिड़की हिला देने वाले डीजे सोई सत्ता शासन की कत्र्तव्य निष्ठा से सहमे लोग हर माह मोटी पगार कबाडने वालों की कत्र्तव्यनिष्ठा पर यक्ष सवाल
वीरेन्द्र भुल्ले
जिन धमाके फटाखे की गूंज से पशु-पक्षी सहर जाते है और दिल-दरबाजे हिला देने वाले डीजे की धमक से नागरिक, मरीज निढाल नजर आते है उनके सेवा कल्याण में तैनात सत्ता शासन में कत्र्तव्य विमुख लोगों की कत्र्तव्यनिष्ठा में गाडी भरे कत्र्तव्य निर्वहन करने में जुटी मोटी पगार कबाडने वालों की फौज पर सवाल होना स्वभाविक है। कत्र्तव्यनिष्ठा के दौर में आज के अशान्तपूर्ण माहौल में शान्तप्रिय जीवन निर्वहन करने वालों के सामने सबसे बडा यक्ष सवाल आज यहीं है।
अगर आम व्यक्ति की माने तो उन्हें आभावों का जीवन आज उतना दुष्कर नहीं लगता जितना अशान्त, असुरक्षित, स्वच्छंद, शान्तिपूर्ण जीवन में अराजक वातावरण की बाधा आये दिन खुशी के वक्त चलने वाले धमाके फटाखों की कान-फाडू दिल-दरवाजे हिलाने वाली गूंज बेजुबान पशु-पक्षियों को ना आने वाली मौत से कम क्यांे ना हो। तो वहीं अनियंत्रित आवाजों में गंूजते डीजे की धमक दिल-दहला देने काफी है। आखिर शान्तिपूर्ण, स्वच्छंद जीवन की आकांक्षा पाले अपने खून पसीने की कमाई को विभिन्न टेक्सों में चुकाकर सत्ता, शासन को मोटी-मोटी पगारों से समृद्ध कर समस्त साधन उपलब्ध कराने वाले उन नागरिकों का क्या दोष है जो वह फटाखे-धमाकों की जानलेवा गंूज और दिल-दहला देने वाले डीजे की धमक का दंश भोगने पर मजबूर है। अब जबकि आये दिन की धमक और अराजक फटाखों की आवाजों की अराजक आजादी पर भले ही सत्ता सियासत में स्वार्थो के चलते कोई चर्चा ना हो। मगर यह उन नागरिकों के साथ और उन वेजुबान पशु-पक्षियों के साथ अन्याय ही कहा जायेगा जो अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कर शान्तप्रिय, स्वच्छंद जीवन जीना चाहते है। मगर आज के कत्र्तव्य विमुख स्वार्थवत वातावरण में यह आशा-आकांक्षायें कितनी फली-भूत होती है यह देखने वाली बात होना चाहिए।
जिन धमाके फटाखे की गूंज से पशु-पक्षी सहर जाते है और दिल-दरबाजे हिला देने वाले डीजे की धमक से नागरिक, मरीज निढाल नजर आते है उनके सेवा कल्याण में तैनात सत्ता शासन में कत्र्तव्य विमुख लोगों की कत्र्तव्यनिष्ठा में गाडी भरे कत्र्तव्य निर्वहन करने में जुटी मोटी पगार कबाडने वालों की फौज पर सवाल होना स्वभाविक है। कत्र्तव्यनिष्ठा के दौर में आज के अशान्तपूर्ण माहौल में शान्तप्रिय जीवन निर्वहन करने वालों के सामने सबसे बडा यक्ष सवाल आज यहीं है।अगर आम व्यक्ति की माने तो उन्हें आभावों का जीवन आज उतना दुष्कर नहीं लगता जितना अशान्त, असुरक्षित, स्वच्छंद, शान्तिपूर्ण जीवन में अराजक वातावरण की बाधा आये दिन खुशी के वक्त चलने वाले धमाके फटाखों की कान-फाडू दिल-दरवाजे हिलाने वाली गूंज बेजुबान पशु-पक्षियों को ना आने वाली मौत से कम क्यांे ना हो। तो वहीं अनियंत्रित आवाजों में गंूजते डीजे की धमक दिल-दहला देने काफी है। आखिर शान्तिपूर्ण, स्वच्छंद जीवन की आकांक्षा पाले अपने खून पसीने की कमाई को विभिन्न टेक्सों में चुकाकर सत्ता, शासन को मोटी-मोटी पगारों से समृद्ध कर समस्त साधन उपलब्ध कराने वाले उन नागरिकों का क्या दोष है जो वह फटाखे-धमाकों की जानलेवा गंूज और दिल-दहला देने वाले डीजे की धमक का दंश भोगने पर मजबूर है। अब जबकि आये दिन की धमक और अराजक फटाखों की आवाजों की अराजक आजादी पर भले ही सत्ता सियासत में स्वार्थो के चलते कोई चर्चा ना हो। मगर यह उन नागरिकों के साथ और उन वेजुबान पशु-पक्षियों के साथ अन्याय ही कहा जायेगा जो अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कर शान्तप्रिय, स्वच्छंद जीवन जीना चाहते है। मगर आज के कत्र्तव्य विमुख स्वार्थवत वातावरण में यह आशा-आकांक्षायें कितनी फली-भूत होती है यह देखने वाली बात होना चाहिए।
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