वोट नीति के भंवर में फसा, समृद्ध देश संघर्ष करती आशा-आकांक्षायें
व्ही.एस.भुल्ले
कहते है किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्तासीन होने में वोट का अहम किरदार होता है। मगर जब एक समृद्ध विरासत अपने सुनहरे भविष्य को लेकर मजबूर हो। ऐसे में वोट नीति के भंवर में फसी सियासत, सत्ता देश में वहां निवासरत लोगों के बीच स्वयं की पहचान स्थापित रख पाना अहम हो जाता है। खासकर तब की स्थिति में जब किसी भी समृद्ध भूभाग पर सत्ता की खातिर सियासत सत्ता के लिये वोट की खातिर परवान चढ रही हो उसके परिणाम भविष्य में जो भी हो। मगर वह सार्थक नहीं कहे जा सकते। एक समृद्ध भूभाग और पुरूषार्थ के परिपूर्ण विरासत वोट नीति के आगे जिस तरह से कलंकित हो रही है यह उस समृद्ध राष्ट्र, समाज, परिवार, व्यक्तियों को समझने वाली बात होना चाहिए। जो लोकतंत्र में आस्था रखने वाले व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र स्वयं पर गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करने में नहीं थकते। वहीं आज दुर्भाग्य बस स्वार्थवत संस्कार, संस्कृति और धन, सत्ता लालसा के चलते आज निराश है।
आज जब स्वयं की समृद्ध, खुशहाल विरासत के लिये वह भूभाग संघर्षरत है जिसकी समृद्धि के परिणाम हजारों वर्ष बाद भी प्रमाणिक तौर पर मौजूद है। मगर ऐसे समृद्ध खुशहाल जीवन के मार्ग में वोट नीति जिस तरह से सियासी संस्कारों के चलते बाधा बन रही है वह सृजन के मार्ग को अवरूद्ध करने काफी है। कहते है सत्ता रूपी रथ को सर्वकल्याण के लिए संचालित करने वाला सार्थी जो भी रहे। मगर इस समृद्ध खुशहाल महान भूभाग की कृतज्ञता कलंकित ना हो। ऐसा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन आज हर किसी का कर्म और धर्म होना चाहिए। फिर व्यक्ति, समाज, परिवार जो भी हो, मगर आज भी अपनी समृद्ध विरासत को साक्षी मान निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन नहीं हुआ तो आने वाला भविष्य अवश्य ऐसी सत्ता सियासत, व्यक्ति, परिवार, समाज को दोषी करार देने में कतई संकोच नहीं करेगा, जिनके सुनहरे भविष्य के लिये आज लाखों करोडों आशा-आकांक्षायें इस महान भूभाग पर संघर्षरत है।
कहते है किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सत्तासीन होने में वोट का अहम किरदार होता है। मगर जब एक समृद्ध विरासत अपने सुनहरे भविष्य को लेकर मजबूर हो। ऐसे में वोट नीति के भंवर में फसी सियासत, सत्ता देश में वहां निवासरत लोगों के बीच स्वयं की पहचान स्थापित रख पाना अहम हो जाता है। खासकर तब की स्थिति में जब किसी भी समृद्ध भूभाग पर सत्ता की खातिर सियासत सत्ता के लिये वोट की खातिर परवान चढ रही हो उसके परिणाम भविष्य में जो भी हो। मगर वह सार्थक नहीं कहे जा सकते। एक समृद्ध भूभाग और पुरूषार्थ के परिपूर्ण विरासत वोट नीति के आगे जिस तरह से कलंकित हो रही है यह उस समृद्ध राष्ट्र, समाज, परिवार, व्यक्तियों को समझने वाली बात होना चाहिए। जो लोकतंत्र में आस्था रखने वाले व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र स्वयं पर गर्व कर स्वयं को गौरान्वित मेहसूस करने में नहीं थकते। वहीं आज दुर्भाग्य बस स्वार्थवत संस्कार, संस्कृति और धन, सत्ता लालसा के चलते आज निराश है। आज जब स्वयं की समृद्ध, खुशहाल विरासत के लिये वह भूभाग संघर्षरत है जिसकी समृद्धि के परिणाम हजारों वर्ष बाद भी प्रमाणिक तौर पर मौजूद है। मगर ऐसे समृद्ध खुशहाल जीवन के मार्ग में वोट नीति जिस तरह से सियासी संस्कारों के चलते बाधा बन रही है वह सृजन के मार्ग को अवरूद्ध करने काफी है। कहते है सत्ता रूपी रथ को सर्वकल्याण के लिए संचालित करने वाला सार्थी जो भी रहे। मगर इस समृद्ध खुशहाल महान भूभाग की कृतज्ञता कलंकित ना हो। ऐसा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन आज हर किसी का कर्म और धर्म होना चाहिए। फिर व्यक्ति, समाज, परिवार जो भी हो, मगर आज भी अपनी समृद्ध विरासत को साक्षी मान निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन नहीं हुआ तो आने वाला भविष्य अवश्य ऐसी सत्ता सियासत, व्यक्ति, परिवार, समाज को दोषी करार देने में कतई संकोच नहीं करेगा, जिनके सुनहरे भविष्य के लिये आज लाखों करोडों आशा-आकांक्षायें इस महान भूभाग पर संघर्षरत है।
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