सत्याग्रह और सर्वकल्याण से जुडी सियासत के लिए सिंधिया की नई शुरूआत
वीरेन्द्र शर्मा
जिस तरह की सियासी सुगबुगाहट सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में उनके दौरों को लेकर चल रही है और विपक्ष जिस तरह से उनके दौरों से पूर्व हमलावर दिखाई दे रहा है उससे लगता है कि सिंधिया सत्य के आग्रह सर्वकल्याण और मूल सिद्धान्तों की सियासत को लेकर अब आर-पार के मूड में नजर आ रहे है। अपने स्वभाव अनुरूप जिस तरह से उन्होंने विगत 15 वर्षो की सियासत के दौरान जो सर्वकल्याण और विकास की लम्बी रेखा आज की सियासत में खींची है। ये अलग बात है और विचारणीय प्रश्न भी कि उनकी सार्थक सहानुभूति उनके संघर्ष को भले ही समूचे प्रदेश में मिली हो। मगर उनके संसदीय क्षेत्र से वह सहानुभूति क्यों ओझल हुई यह आज की सियासत में और सेवा कल्याण सहित सर्वकल्याण में विश्वास रखने वालों के लिए चर्चा का विषय हो सकता है। मगर लगता नहीं सिंधिया की कार्यशैली से कि उन्होंने आज भी अपना मार्ग बदला है या षड़यंत्रपूर्ण सियासत से वह विचलित हो वह हताश निराश हुये है।
चूंकि सिंधिया परिवार की कार्यशैली को आगे बढाते हुये उन्होंने जनकल्याण, सेवा भाव और क्षेत्र के अदभुत विकास को हमेशा से प्राथमिकता दी है। मगर सियासी व्यस्तायें और सेवा कल्याण में जुडी आस्थाओं के बीच शायद उनका संवाद ऐसा स्थापित होना संभव ना हो सका। जो संवाद स्व. माधवराव सिंधिया का आमजन के बीच होता रहा है। हालांकि अपने पिता से एक कदम आगे जाकर लोगों के सुख-दुख में जाना और अप्रत्याशित जनकल्याण, जनसेवा से जुडी योजनाओं को लाकर उनका क्रियान्वयन कराना उनकी कार्यशैली में रहा। मगर कहते है कि समय और संवाद उस गाडी के दो चके होते है कि अगर उनमें बेहतर समन्वय बना रहे तो वह अपने मुकाम या लक्ष्य तक उस गाडी को लेकर अवश्य पहुंचते है। शायद सिंधिया की आज की सियासत में यहीं उम्मीद उन्हें सत्य के आग्रह का अगुआ और सेवा कल्याण से जुडी मूल्य सिद्धान्त की राजनीति का धोतक साबित करने में कोई संकोच नहीे करती शायद सिंधिया का यहीं विश्वास आज की सियासत में सबसे बडा संबल है जिसे लेकर वह एक मर्तवा फिर से नये जोश के साथ एक ऐसी सियासी शुरूआत मंे जुट गये है जो आज नहीं तो कल सार्थक भी होगी और सिद्ध भी।
जिस तरह की सियासी सुगबुगाहट सिंधिया के संसदीय क्षेत्र में उनके दौरों को लेकर चल रही है और विपक्ष जिस तरह से उनके दौरों से पूर्व हमलावर दिखाई दे रहा है उससे लगता है कि सिंधिया सत्य के आग्रह सर्वकल्याण और मूल सिद्धान्तों की सियासत को लेकर अब आर-पार के मूड में नजर आ रहे है। अपने स्वभाव अनुरूप जिस तरह से उन्होंने विगत 15 वर्षो की सियासत के दौरान जो सर्वकल्याण और विकास की लम्बी रेखा आज की सियासत में खींची है। ये अलग बात है और विचारणीय प्रश्न भी कि उनकी सार्थक सहानुभूति उनके संघर्ष को भले ही समूचे प्रदेश में मिली हो। मगर उनके संसदीय क्षेत्र से वह सहानुभूति क्यों ओझल हुई यह आज की सियासत में और सेवा कल्याण सहित सर्वकल्याण में विश्वास रखने वालों के लिए चर्चा का विषय हो सकता है। मगर लगता नहीं सिंधिया की कार्यशैली से कि उन्होंने आज भी अपना मार्ग बदला है या षड़यंत्रपूर्ण सियासत से वह विचलित हो वह हताश निराश हुये है।चूंकि सिंधिया परिवार की कार्यशैली को आगे बढाते हुये उन्होंने जनकल्याण, सेवा भाव और क्षेत्र के अदभुत विकास को हमेशा से प्राथमिकता दी है। मगर सियासी व्यस्तायें और सेवा कल्याण में जुडी आस्थाओं के बीच शायद उनका संवाद ऐसा स्थापित होना संभव ना हो सका। जो संवाद स्व. माधवराव सिंधिया का आमजन के बीच होता रहा है। हालांकि अपने पिता से एक कदम आगे जाकर लोगों के सुख-दुख में जाना और अप्रत्याशित जनकल्याण, जनसेवा से जुडी योजनाओं को लाकर उनका क्रियान्वयन कराना उनकी कार्यशैली में रहा। मगर कहते है कि समय और संवाद उस गाडी के दो चके होते है कि अगर उनमें बेहतर समन्वय बना रहे तो वह अपने मुकाम या लक्ष्य तक उस गाडी को लेकर अवश्य पहुंचते है। शायद सिंधिया की आज की सियासत में यहीं उम्मीद उन्हें सत्य के आग्रह का अगुआ और सेवा कल्याण से जुडी मूल्य सिद्धान्त की राजनीति का धोतक साबित करने में कोई संकोच नहीे करती शायद सिंधिया का यहीं विश्वास आज की सियासत में सबसे बडा संबल है जिसे लेकर वह एक मर्तवा फिर से नये जोश के साथ एक ऐसी सियासी शुरूआत मंे जुट गये है जो आज नहीं तो कल सार्थक भी होगी और सिद्ध भी।
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