तथाकथित अंधी, बेहरी, अचेत संस्कृति में, सृजन का सूत्रपात मुझे डर है कि कहीं स्वार्थवत संस्कृति मेरा माथा न चूम लें
व्ही.एस.भुल्ले
कहते है जब-जब सत्ताओं, समाज और संस्थाओं का पुरूषार्थ सामर्थ, स्वार्थवत संस्कृति, संस्कारों के सामने कमजोर हुआ है तथा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन अपने पुरूषार्थ से विमुख हुआ है। तब-तब सृजन में समृद्ध, खुशहाल जीवन संकटग्रस्त हो, सृजन में निष्ठा रखने वाले व निष्ठापूर्ण पुरूषार्थ कर, कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले समाज, संस्था, सियासत स्वयं की सार्थकता के मोहताज हुये है। जिस तरह से आज तथा कथित संस्कृति, संस्कारों का समाज, संस्था, सियासत के चलते पृथ्वी पर मौजूद महान भूभाग जिसे कभी जम्मूद्वीप भरतखण्डे के नाम से जाना जाता था और जो अनादिकाल से समृद्ध, खुशहाल भी रहा है और इस भूभाग पर ऐतिहासिक पुरूषार्थ भी होता रहा है। ऐसे में अस्तित्व बनाती तथाकथित अंधी बेहरी अचेत स्वार्थवत संस्कृति कहीं मेरा भी माथा न चूम लें। यहीं डर आजकल मुझे नासूर बना है।
डर तो कभी माथा न चूम लेने का गालिव को भी रहा था। क्योंकि जब वह 5-6 वर्ष के थे तब उनके बालिद पिता और चचा उनका माथा चूमकर अपने कत्र्तव्य निर्वहन को गये थे। उनकी मां और फूफी बताया करती थी कि उनके परिवार का संस्कार और संस्कृति क्या रही है। जिसका उल्लेख अपने जीवन दर्शन में भी उन्होंने किया। जब वह युवा अवस्था में बडी-बडी संगतों में शेर और शायरी कलाम पढा करते थे, तो उनके उस्ताद उनकी अदभुत कामयाबी पर उन्हें गले से लगा आर्शीवाद प्रदान करते थे। तब उन्हें डर रहता था कि मेरे उस्ताद कहीं गलती से मेरा माथा न चूम ले। अबोध उम्र का सार्थक संस्कारिक डर कितना गहरा होता है यह अच्छी संस्कृति और संस्कारों से ही सीखा जा सकता है। मगर मेरा डर वाल्य युवा नहीं बल्कि परिपक्व है। क्योंकि जब मेरी मां चिकित्सीय लाभ ले रही थी तो उन्होंने भी अंतिमबार मेरे दोनों हाथ गाल और माथा चूम कहा था कि भैया अब कब लौटोगे। क्योंकि मेरे को भी अपने कत्र्तव्य निर्वहन के लिये मां से 125 किलामीटर दूर रोज आना-जाना करना होता था। मगर जब मैं अलसुबह वापिस लौटा तो ना वह शब्द थे और ना ही अपने बच्चे को निहारने वाली आंखे खुली थी। इसलिए माथा चूमने की संस्कृति के संस्कारिक परिणाम जो भी हो। मगर उनकी सार्थकता पर सवाल नहीं हो सकते।
बहरहाल डर साफ है कि संस्कार, संस्कृति को बलपूर्वक या छलपूर्वक प्रभावित करने वाले समाज, सियायत, सत्ताओं को आज समझने वाली बात यह होना चाहिए कि कहीं ऐसा ना हो कि एक पलडा सर्वकल्याण की सियासत से जुडा हो और दूसरा पलडा स्वार्थ में डूबी स्वकल्याण के बाद सर्वकल्याण की सियासत से। ऐसे में सार्थक से सार्थक समाधान सृजन में दूर की कोणी ही साबित होते है यही डर चिन्ता इस महान राष्ट्र के हर उस नागरिक को होना चाहिए। क्योंकि त्याग-तपस्या कुर्बानियों से भरा यह महान भूभाग ना तो कभी स्वार्थवत संस्कृति, संस्कार, सत्ता, समाजों को मोहताज रहा ना ही भविष्य में रहने वाला। काश भारतवर्ष के भ्रमित कुछ महान भाव इस सच को समझ पाये जो प्रकृति, मानव, समस्त जीव-जगत के कल्याण से इतर स्वकल्याण को सर्वकल्याण मानते है। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि हम हमेशा से ही समृद्ध, खुशहाल जीवन के साथ आध्यात्म के आगाद पुरोदा भी रहे और रहेंगे। हमारा मूल स्वभाव सृजन में सार्थक कत्र्तव्य निर्वहन का निष्ठापूर्ण रहा है और स्वाभिमान हमारी विरासत, यहीं समृद्ध, शसक्त, खुशहाल भारतवर्ष की पहचान है।
कहते है जब-जब सत्ताओं, समाज और संस्थाओं का पुरूषार्थ सामर्थ, स्वार्थवत संस्कृति, संस्कारों के सामने कमजोर हुआ है तथा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन अपने पुरूषार्थ से विमुख हुआ है। तब-तब सृजन में समृद्ध, खुशहाल जीवन संकटग्रस्त हो, सृजन में निष्ठा रखने वाले व निष्ठापूर्ण पुरूषार्थ कर, कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले समाज, संस्था, सियासत स्वयं की सार्थकता के मोहताज हुये है। जिस तरह से आज तथा कथित संस्कृति, संस्कारों का समाज, संस्था, सियासत के चलते पृथ्वी पर मौजूद महान भूभाग जिसे कभी जम्मूद्वीप भरतखण्डे के नाम से जाना जाता था और जो अनादिकाल से समृद्ध, खुशहाल भी रहा है और इस भूभाग पर ऐतिहासिक पुरूषार्थ भी होता रहा है। ऐसे में अस्तित्व बनाती तथाकथित अंधी बेहरी अचेत स्वार्थवत संस्कृति कहीं मेरा भी माथा न चूम लें। यहीं डर आजकल मुझे नासूर बना है। डर तो कभी माथा न चूम लेने का गालिव को भी रहा था। क्योंकि जब वह 5-6 वर्ष के थे तब उनके बालिद पिता और चचा उनका माथा चूमकर अपने कत्र्तव्य निर्वहन को गये थे। उनकी मां और फूफी बताया करती थी कि उनके परिवार का संस्कार और संस्कृति क्या रही है। जिसका उल्लेख अपने जीवन दर्शन में भी उन्होंने किया। जब वह युवा अवस्था में बडी-बडी संगतों में शेर और शायरी कलाम पढा करते थे, तो उनके उस्ताद उनकी अदभुत कामयाबी पर उन्हें गले से लगा आर्शीवाद प्रदान करते थे। तब उन्हें डर रहता था कि मेरे उस्ताद कहीं गलती से मेरा माथा न चूम ले। अबोध उम्र का सार्थक संस्कारिक डर कितना गहरा होता है यह अच्छी संस्कृति और संस्कारों से ही सीखा जा सकता है। मगर मेरा डर वाल्य युवा नहीं बल्कि परिपक्व है। क्योंकि जब मेरी मां चिकित्सीय लाभ ले रही थी तो उन्होंने भी अंतिमबार मेरे दोनों हाथ गाल और माथा चूम कहा था कि भैया अब कब लौटोगे। क्योंकि मेरे को भी अपने कत्र्तव्य निर्वहन के लिये मां से 125 किलामीटर दूर रोज आना-जाना करना होता था। मगर जब मैं अलसुबह वापिस लौटा तो ना वह शब्द थे और ना ही अपने बच्चे को निहारने वाली आंखे खुली थी। इसलिए माथा चूमने की संस्कृति के संस्कारिक परिणाम जो भी हो। मगर उनकी सार्थकता पर सवाल नहीं हो सकते।
बहरहाल डर साफ है कि संस्कार, संस्कृति को बलपूर्वक या छलपूर्वक प्रभावित करने वाले समाज, सियायत, सत्ताओं को आज समझने वाली बात यह होना चाहिए कि कहीं ऐसा ना हो कि एक पलडा सर्वकल्याण की सियासत से जुडा हो और दूसरा पलडा स्वार्थ में डूबी स्वकल्याण के बाद सर्वकल्याण की सियासत से। ऐसे में सार्थक से सार्थक समाधान सृजन में दूर की कोणी ही साबित होते है यही डर चिन्ता इस महान राष्ट्र के हर उस नागरिक को होना चाहिए। क्योंकि त्याग-तपस्या कुर्बानियों से भरा यह महान भूभाग ना तो कभी स्वार्थवत संस्कृति, संस्कार, सत्ता, समाजों को मोहताज रहा ना ही भविष्य में रहने वाला। काश भारतवर्ष के भ्रमित कुछ महान भाव इस सच को समझ पाये जो प्रकृति, मानव, समस्त जीव-जगत के कल्याण से इतर स्वकल्याण को सर्वकल्याण मानते है। हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि हम हमेशा से ही समृद्ध, खुशहाल जीवन के साथ आध्यात्म के आगाद पुरोदा भी रहे और रहेंगे। हमारा मूल स्वभाव सृजन में सार्थक कत्र्तव्य निर्वहन का निष्ठापूर्ण रहा है और स्वाभिमान हमारी विरासत, यहीं समृद्ध, शसक्त, खुशहाल भारतवर्ष की पहचान है।
Comments
Post a Comment