समृद्धि को मुंह चिढ़ाती स्वार्थवत, सत्ता, सियासत, संस्कृति, संस्कार सत्ता, सियासत के बीच समृद्धि हुई कलंक पुरूषार्थ हुआ मोहताज


व्ही.एस.भुल्ले
अगर यो कहे कि हमारे महान भूभाग जिसके जर्रे-जर्रे में संपदा समृद्धि के भण्डार भरे पढे है तो किसी को अतिसंयोक्ति नही होना चाहिए। मगर जिस तरह से स्थार्थवत सत्ता, सियासत, संस्कृति, संस्कारों के चलते हमारी नैसर्गिक संपदा समृद्धि को मुंह चिढाया गया और मौजूद पुरूषार्थ को कलंकित कर भविष्य को अंधकारमय बनाया है वह आने वाले भविष्य में शर्मनाक ही कहा जायेगा। क्योंकि हमारा महान भूभाग ना तो संपदा से कभी बांझ रहा है और ना ही पुरूषार्थ जो हमारी विरासत है। 
ऐसे में स्वार्थवत, सत्ता सियासत के बीच कंगाल हमारी समृद्धि अपने आप में एक सवाल है। जिस पर विचार अवश्य होना चाहिए। जहां तक हमारी समृद्धि और अर्थव्यवस्था का सवाल है तो अगर हम चाहे तो डाॅलर को रूपये के बराबर खड़ा सकते है। मगर स्वार्थवत, सत्ता सियासत ने, ऐसा होने नहीं दिया। जिसका आज प्रार्दुभाव स्वार्थवत संस्कृत, संस्कृति के रूप में मौजद है। जो हमारे बुजुर्गो द्वारा कडी त्याग, तपस्या कुर्बानियांें से भरी विरासत पर कलंक है। आज उस महान राष्ट्र में विश्वास रखने वालो को सबसे बडी समझने वाली बात होना चाहिए। कहते है जो अपने अतीत अस्तित्व पर संदेह करते है उनकी पहचान पुरूषार्थ हमेशा संदेहप्रद रहता है। हम यथार्थ है और प्रचूर संपदा, समृद्धि, हमारी पहचान काश इस अदने से सत्य को हम समझ पाये।

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