सत्ता की हनक में डूबा शासन सियासी दांव पेंच में स्वाहा होते सरोकार

वीरेन्द्र भुल्ले
जिस तरह की सत्ता हनक का आगाज विगत 26 वर्षो से इस म.प्र. के समृद्ध भूभाग और भोले-भाले नागरिकों की आकांक्षाओं पर भारी पड रहा है वह रूकता दिखाई नहीं पडता। ये अलग बात है कि म.प्र. की भोली-भाली भावुक जनता इस उम्मीद में तीन बार म.प्र. का निजाम इन 26 वर्षो में अपनी वोट की ताकत से कुचल चुकी है। मगर सियासत है कि सीख लेने का नाम ही नहीं लेती और ना ही वह उन आशा-आकांक्षाओं को समझना चाहती जिसके लिए सत्तायें, सरकार और सियासत किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में अस्तित्व में होती है। आज जिस तरह से सियासत बंटी हुई है और संपदा सहित संसाधनों पर अपना हक जमा अपने मंसूबे सिद्ध करने पर तुली है वह किसी से छिपा नहीं। 
मगर कहते है कि संवैधानिक व्यवस्था में जितने अधिकार और कत्र्तव्य चुनी हुई सत्ताओं के है उससे कहीं अधिक व्यवहारिक अधिकार शासन के निमित होते है। मगर इस संवैधानिक सन्तुलन से इतर शासन, सरकारों के पलडे़ में बैठ सेवा कल्याण विकास से इतर सियासत के इशारे पर जुटा है वह ना तो न्याय प्रिय ही कहा जायेगा और ना ही कभी सराहा जायेगा। सत्तासीन दल की हनक गाये-बगाये जो भी हो। मगर सर्वकल्याण का भाव जिस तरह से सियासत के दरवाजे पर दम तोडता नजर आ रहा है वह शर्मनाक भी है और दर्दनाक भी। ये अलग बात है कि म.प्र. के मुख्यमंत्री कमलनाथ अपने सूझबूझ और अनुभव सहित सरकार की आवश्यकता अनुसार एक न्याय व सर्वकल्याण का राज स्थापित करने संघर्षरत हो। मगर एक वर्ष का कार्यकाल उनका भले ही प्रदेश की समृद्धि सियासत की आड में लूटने वाले व सार्वजनिक संपदा को हडपने वालों पर हनक भरा रहा हो। तो वहीं पशुधन संरक्षण की पहल से मूल संस्कृति के प्रार्दुभाव की संभावना प्रबल हुई हो। मगर एक वर्ष बाद प्रमाणिक तौर पर किसी भी क्षेत्र में प्रमाणों का उपलब्ध ना हो पाना अपने आप में एक सवाल है। फिर कारण सरकार के सियासी अंतर विरोध हो या फिर सत्ता में बने रहने की सियासी मजबूरी। मगर जो विजन या सियासी गिलांस इस भोले-भाले भावुक प्रदेश के सामने आना था उसमें म.प्र. की सरकार एक वर्ष में असफल अक्षम सिद्ध ही कही जायेगी। देखना होगा कि जिस दृढता और कार्य शैली के लिए म.प्र. के मुख्यमंत्री कमलनाथ जाने जाते है वह उसको कब तक सिद्ध कर पाते है। 

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