सत्ता, सियासत, समाज जब-जब कमजोर हुये है तब-तब सर्वकल्याण, सेवाभावी सियासत सार्थकता की मोहताज हुई है दरियादिली का दंश भोगता देश गांधी की सार्थकता में मिल सकता है स्वीकार्य समाधान विनाश की ओर बढती स्वार्थवत सियासत
व्ही.एस.भुल्ले
विधान के विरूद्ध संविधान को अंगीकार करने वालों की अनुशासनहीनता का फिलहाल अगर यहीं संदेश है तो भविष्य का अन्दाजा स्वतः सिद्ध दिखाई पडता है।
अहिंसा सर्वकल्याण, सेवाभाव में अकूत विश्वास रखने वाले अहिंसावादी गांधीजी की दरियादिली आज दंश के रूप में कभी इस तरह बदनाम होगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। कारण समाज, सत्ता, सियासत और संस्थाओं का कमजोर हो, कत्र्तव्य विमुख होना। अगर संविधान की शक्तियों का सदपयोग करने वाले लोकतंत्र में सजग, निष्ठावान रहते तो एक समृद्ध खुशहाल राष्ट्र को आज यह दिन नहीं देखना पडता। बहरहाल जो भी हो अगर सुधार की शुरूआत इस महान भूभाग पर हुई है तो सत्ता का राजधर्म है कि वह गांधीजी के उस सच को आमजन के बीच ले जाये जिसे दया की जगह स्वार्थवत सियासत के चलते र्दुदान्त सिद्ध करने की कोशिश हुई है। वो कौन लोग थे या कौन लोग है जिन्होंने गांधीजी की त्याग-तपस्या और कुर्बानी को दरकिनार कर अपना सियासी इकबाल बुलंद किया। निश्चित ही आज गांधीजी की रूह अगर कहीं है तो दुखित होगी। मगर प्रसंन्न भी जो आज उनके विचार, कार्यशैली की सार्थकता सिद्ध हो रही है। क्योंकि जिस दृष्ढता के साथ अनुशासित रह सत्ता आज अपने निष्ठापूर्ण, कत्र्तव्य निर्वहन के लिए कृतज्ञ दिख रही है। ऐसे में समझने वाली बात सत्य और संविधान को अंगीकार कर निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वालों के लिए यह है कि सत्ताओं का राजधर्म उस भूभाग को सुरक्षित संरक्षित करने के साथ उस भूभाग पर निवासरत लोगों के जीवन को खुशहाल, समृद्ध, सुरक्षित बनाने का होता है जो विधान से ऊपर संविधान को अंगीकार कर अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते है। उन्हें ऐसी सत्ता, संस्थाओं और समाज के प्रति कृतज्ञ रहना ही उनकी मानव जीवन के रूप में सच्ची कृतज्ञता है, जो सत्य अपने आप में सिद्ध है। काश इस सच को हम समझ पाये।
जय स्वराज
विधान के विरूद्ध संविधान को अंगीकार करने वालों की अनुशासनहीनता का फिलहाल अगर यहीं संदेश है तो भविष्य का अन्दाजा स्वतः सिद्ध दिखाई पडता है। अहिंसा सर्वकल्याण, सेवाभाव में अकूत विश्वास रखने वाले अहिंसावादी गांधीजी की दरियादिली आज दंश के रूप में कभी इस तरह बदनाम होगी किसी ने सपने में भी न सोचा होगा। कारण समाज, सत्ता, सियासत और संस्थाओं का कमजोर हो, कत्र्तव्य विमुख होना। अगर संविधान की शक्तियों का सदपयोग करने वाले लोकतंत्र में सजग, निष्ठावान रहते तो एक समृद्ध खुशहाल राष्ट्र को आज यह दिन नहीं देखना पडता। बहरहाल जो भी हो अगर सुधार की शुरूआत इस महान भूभाग पर हुई है तो सत्ता का राजधर्म है कि वह गांधीजी के उस सच को आमजन के बीच ले जाये जिसे दया की जगह स्वार्थवत सियासत के चलते र्दुदान्त सिद्ध करने की कोशिश हुई है। वो कौन लोग थे या कौन लोग है जिन्होंने गांधीजी की त्याग-तपस्या और कुर्बानी को दरकिनार कर अपना सियासी इकबाल बुलंद किया। निश्चित ही आज गांधीजी की रूह अगर कहीं है तो दुखित होगी। मगर प्रसंन्न भी जो आज उनके विचार, कार्यशैली की सार्थकता सिद्ध हो रही है। क्योंकि जिस दृष्ढता के साथ अनुशासित रह सत्ता आज अपने निष्ठापूर्ण, कत्र्तव्य निर्वहन के लिए कृतज्ञ दिख रही है। ऐसे में समझने वाली बात सत्य और संविधान को अंगीकार कर निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वालों के लिए यह है कि सत्ताओं का राजधर्म उस भूभाग को सुरक्षित संरक्षित करने के साथ उस भूभाग पर निवासरत लोगों के जीवन को खुशहाल, समृद्ध, सुरक्षित बनाने का होता है जो विधान से ऊपर संविधान को अंगीकार कर अपना निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते है। उन्हें ऐसी सत्ता, संस्थाओं और समाज के प्रति कृतज्ञ रहना ही उनकी मानव जीवन के रूप में सच्ची कृतज्ञता है, जो सत्य अपने आप में सिद्ध है। काश इस सच को हम समझ पाये।
जय स्वराज
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