सार्थक होता सत्याग्रह, अहिंसा, सविनय अवज्ञा, गुठ निरपेक्ष आन्दोलन

व्ही.एस.भुल्ले
आज जिस मुहाने पर विश्व और हमारा समृद्ध, महान भारतवर्ष खडा है उसका सार्थक, स्वीकार्य समाधान भी आज यहीं महान भूभाग दे सकता है। अपने महान आध्यात्म संस्कृति, पुरूषार्थ, समृद्धि के लिए जाने पहचाने जाने वाले इस महान भूभाग का आज भी ना तो उसका आध्यात्म, पुरूषार्थ बांझ हुआ है ना ही उसकी बौद्धिक संपदा और समृद्धि। मगर सवाल आज भी सौ टके का वहीं है कि सत्य का आग्रह स्वीकारने वाले या सविनय अवज्ञा के पक्षधर विश्व विरादारी ही नहीं इस महान भारतवर्ष में कितने लोग है जो मानव, कल्याण और सृजन में स्वयं की सार्थकता सिद्ध करने गुठ निरपेक्ष आन्दोलन के पक्षधर है। अगर इन सवालों के जबाव निष्ठापूर्ण ढंग से दुनिया और हमारा देश ढूंढ पाया तो यह समस्त जीव जगत मानवता के हित में है यह निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन उस सत्ता, सियासत, सरकारों, सियासी दल,  समाज, संगठन, राष्ट्र, नागरिकों के हित में भी है जिनकी निष्ठापूर्ण आस्था समृद्ध, खुशहाल, जीवन एवं अन्य जीव जगत में संरक्षण में अपने नैसर्गिक कत्र्तव्य अनुसार है या जो अपना कत्र्तव्य निर्वहन सृजन में स्वयं की उपायदेयता के रूप में सत्य को साक्षी मान सिद्ध करना चाहते है। मगर यह तभी संभव है जब सत्य को साक्षी मान सृजन में कत्र्तव्य निर्वहन वाला मानव बगैर किसी पूर्वाग्रह के अपने कत्र्तव्यों का निर्वहन करंे। मगर दुर्भाग्य कि स्वार्थवत सियासत और महत्वकांक्षापूर्ण सत्तायें आज ही नहीं अनादिकाल से स्वयं के हितों को लेकर सृजन में कत्र्तव्य के मार्ग की बाधायें बनती रही है। आज समूची विश्व विरादरी और मानवता में आस्था रखने वाले हर मानव के लिए यहीं समझने वाली बात होना चाहिए। 

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