स्वकल्याण, स्वार्थवत, स्वयंभू सत्ताओं के रहते सर्वकल्याण असंभव मैकाले शिक्षा में स्वाहा होते प्रतिभा, विधा, विद्ववान राष्ट्र के मान-सम्मान, विधा, विद्यवानों की अनदेखी घातक निर्जीव संस्कृति का शिकार समृद्ध, खुशहाल देश
व्ही.एस.भुल्ले
आज की सत्ता सियासत और सरकारों में हावी काॅरपोरेट कल्चर और स्वार्थवत संस्कृति के चलते अब गांव, गली के मजदूर किसान को तय करना होगा कि वह अपनी आने वाली पीढी को समृद्ध खुशहाल बनाने कितनी बडी कीमत पर हमारा बचपन, युवा, बुजुर्ग चुकाने पर मजबूर है। यह सवाल आजादी से लेकर यक्ष बना हुआ है। आखिर वह कौन से कारण है कि जिस समृद्ध भूभाग की संस्कृति, संपदा, पुरूषार्थ नैसर्गिक रूप से समृद्ध रहा है और निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य उसका धर्म। उसके बावजूद भी उस महान भूभाग के लोग क्यों आभावग्रस्त जीवन और अराजकता का दंश झेलने पर मजबूर है। क्या दोष है हमारे अपनों कि हम हाड-तोड मेहनत और बगैर जाने समझे बैवस पैदा होने से लेकर मरने तक के समस्त अधिकार सत्ताओं को देने के बावजूद भी अभावग्रस्त मजबूर जीवन जीने पर मजबूर है।
कारण साफ है कि हम अपने निहित, छणिक, स्वार्थो के सामने अपनी समृद्धि पुरूषार्थ से समझौता कर ऐसी सत्तायें चुनते है। जिनका अन्तिम लक्ष्य ही सर्वकल्याण से इतर स्वकल्याण होता है और जिनका सर्वकल्याण, काॅरपोरेट कल्चर आधारित होता है। कारण मैकाले की शिक्षा नीति के घोडे पर सवार सत्ताओं की टापो तले बडी ही बेरहमी से हमारी बहुमूल्य संपदा प्रतिभा, विद्या, विद्ववानों की संस्कृति को कुचला जाता रहा है। मगर कहते है कि सत्य ओझल हो सकता है मगर परास्त नहीं। आज समय आ गया जब कुछ सत्तायें संगठन भले ही मैकाले से प्रभावित हो। मगर उनके राष्ट्र प्रेम समर्पण से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में जरूरत है प्रबल सृजन में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले उन विद्या, विद्ववान, प्रतिभाओं के संरक्षण की, जो इतिहास को चुटकियों में सिद्ध कर इस महान भूभाग को अपने प्रेम, विद्ववतता, पुरूषार्थ पूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से पुनः समृद्ध खुशहाल बना सकते है।
जय स्वराज

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