प्रधानमंत्री के सदन में स्वीकार्य सत्य से सियासत को सीखने की जरूरत वर्तमान की बैवसी पर, भविष्य की अनदेखी, भावी पीडी से विश्वासघात सृष्टि में सत्य सृजन की आत्मा तो कत्र्तव्य निर्वहन अंतिम लक्ष्य होना चाहिए तथ्यात्मक सियासी सीख और संगठनात्मक आधार ही सर्वकल्याण में सहायक होता है
व्ही.एस.भुल्ले
राष्ट्रपति जी के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुये जिन तथ्यों के साथ प्रधानमंत्री ने सरकार का पक्ष लोकतंत्र के मंदिर सर्वोच्च सदन में बिन्दुबार रखा और जिस आत्म विश्वास और तथ्यात्मक शैली के आधार पर सियासी दलों द्वारा सरकार पर लगाये आरोपों का जबाव दिया इससे आज की सियासत को लोकतंत्र और जनतंत्र के हित में स्वयं को सिद्ध करने की कला अवश्य सीखना चाहिए। खासकर उन दलों को जो लम्बे समय तक सत्ता में रहे और उन दलों के नेतृत्वों को जो आज उन्हें संचालित कर रहे है। कहते है कि सियासत में कोई भी दल अपना घर किसी को नहीं बताता। मगर यह देश के प्रधानमंत्री की खूबी है कि वह आज की सियासत को घर भी दिखाते है और आगे का मार्ग भी बताते है। जिस संजीदगी के साथ कडे से कडे आरोप और भाषाशैली का उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से जबाव दिया वह आज के सियासी दलों को काबिले गौर होना चाहिए। फिर चाहे वह अधोरंचना निर्माण, सेवा कल्याण या फिर राष्ट्र-हित में लिए गए निर्णयों से जुडा मसला रहा हो। सदन के गर्मा-गरम आरोप-प्रत्यारोप के माहौल को अपनी वाणी और व्यंगशैली से ठण्डा कर सियासी तथ्य को सत्य के सामने रख सरकार का पक्ष रखने वाले प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र की जटोलताओं के बावजूद जिस सगार्वित शैली के साथ सिद्ध किया यह किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए शुभसंकेत ही कहा जायेगा।
ये अलग बात है कि प्रधानमंत्री के दल और उनकी मात्र संस्था के व्यवहारिक सियासी स्वरूप से अन्य दल सहमत न हो। मगर लोकतंत्र के इस सत्य को नहीं छिपाया जा सकता कि लोकतांत्रिक सरकारों की समाज और संस्थाओं के बीच क्या समस्यायें होती है और लोकतांत्रिक तरीके से उनका समाधान सत्य को सामने रख कैसे निकाला जाता है। निश्चित ही किसी भी मानव, समाज या संस्थाओं के आधार उसके नैसर्गिक गुण ही होते है और उसकी संस्कृति जो उसे प्राराव्ध या मौजूद संसाधनों से प्राप्त होती है। अगर कहीं स्वच्छंद जीवन जीने वालो के समृद्ध जीवन की बाधा उसका शान्तप्रिय जीवन अनादिकाल से रहा है तो इसे एक बडा बदलाव कहा जायेगा। क्योंकि जिस लचीले लोकतंत्र में हमारी कई पीडियों ने सांस ली और समय-समय पर जिन पुरूषार्थियों ने नेतृत्व किया। हो सकता है उनके पक्ष और विपक्ष में सियासी सुविधा अनुसार कुछ सवाल हो। जिनका सदपयोग, दुरूपयोग कर लोग सत्ता तक पहुंचते रहे है। मगर प्रधानमंत्री जी ने जिस तरह से एक कुशल सार्थी की तरह 130 करोड की जनसंख्या वाले रथ को सकुशल खींचने का सियासी संदेश दिया है उस पर देश भर में विचार और चर्चा अवश्य होना चाहिए न कि सत्ता के लिए सियासी वेमनस्यता का माहौल सियासी गलियारों में निर्मित होना चाहिए। प्रधानमंत्री जी की कार्यशैली से स्पष्ट है कि सरकार का नेतृत्व जैसा हो बैसा दिखना ही नहीं मेहसूस भी होना चाहिए। जब देश का जनसमर्थन सदन में सरकार के साथ है तो कडे से कडे सवाल सडक के बजाये सदन में हो तो यह समृद्ध लोकतंत्र की खूबी होगी। मगर जिस तरह की चिन्ता आज हर राष्ट्र के लिए कृतज्ञ नागरिक के बीच समृद्ध, शसक्त सरकारांे के रहते बनी रहती है और कभी-कभी बडा सवाल बन सरकारों के मार्ग की बाधायें बनती है। इनके लिए भी सरकारों को एक निष्ठापूर्ण ईमानदार कोशिश कर स्वयं की कृतज्ञता साबित करना चाहिए। विगत 6 वर्षो से ही नहीं आजादी से लेकर आज तक रोजगार को लेकर जो बडा सवाल हमारी सरकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कलंक साबित होते रहे है। अगर उसके समाधान की कोशिश ईमानदारी से हो, तो न तो भारत जैसे देश में रोजगार की कोई समस्या होगी और न ही सवाल और न ही आशा-आकांक्षा लिए आभावग्रस्त जीवन जीने वाले लोगों का जीवन आभावग्रस्त। सवाल सरकारों की निष्ठापूर्ण और ईमानदार सोच पर निर्भर करता है। क्योंकि भारतवर्ष में समृद्धि की कोई कमी नहीं। अगर कोई कमी है तो मेकाले के तथाकथित विश्व विद्यालय और काॅरपोरेट कल्चर में डूबे सियासी दलों के बीच है। अगर इस सत्य को हमारी सत्तायें और हम सिद्ध कर पाये तो यह उस महान भूभाग की महान विरासत की सिद्धता होगी जिसके आध्यात्म, विज्ञान, गणित का इतिहास आज भी भरा पडा है और नैसर्गिक विधायें, प्रतिभायें लाखों-करोडों की संख्या में मौजूद है। अब इस पर विचार हम सभी को मिलकर करना है। बेहतर हो कि सत्ता के नेतृत्व ग्रेडिंग सिस्टम से बाहर निकल सत्य, संवाद गावं गली तक सुलभ बनायें। समाधान अवश्य मिलेगा क्योंकि प्रतिभा, विद्ववानों से यह भूभाग आज भी पटा पडा है। रोजगार कोई समस्या है ही नहीं सिर्फ सार्थक समाधान देना है।
जय स्वराज
राष्ट्रपति जी के धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुये जिन तथ्यों के साथ प्रधानमंत्री ने सरकार का पक्ष लोकतंत्र के मंदिर सर्वोच्च सदन में बिन्दुबार रखा और जिस आत्म विश्वास और तथ्यात्मक शैली के आधार पर सियासी दलों द्वारा सरकार पर लगाये आरोपों का जबाव दिया इससे आज की सियासत को लोकतंत्र और जनतंत्र के हित में स्वयं को सिद्ध करने की कला अवश्य सीखना चाहिए। खासकर उन दलों को जो लम्बे समय तक सत्ता में रहे और उन दलों के नेतृत्वों को जो आज उन्हें संचालित कर रहे है। कहते है कि सियासत में कोई भी दल अपना घर किसी को नहीं बताता। मगर यह देश के प्रधानमंत्री की खूबी है कि वह आज की सियासत को घर भी दिखाते है और आगे का मार्ग भी बताते है। जिस संजीदगी के साथ कडे से कडे आरोप और भाषाशैली का उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से जबाव दिया वह आज के सियासी दलों को काबिले गौर होना चाहिए। फिर चाहे वह अधोरंचना निर्माण, सेवा कल्याण या फिर राष्ट्र-हित में लिए गए निर्णयों से जुडा मसला रहा हो। सदन के गर्मा-गरम आरोप-प्रत्यारोप के माहौल को अपनी वाणी और व्यंगशैली से ठण्डा कर सियासी तथ्य को सत्य के सामने रख सरकार का पक्ष रखने वाले प्रधानमंत्री ने लोकतंत्र की जटोलताओं के बावजूद जिस सगार्वित शैली के साथ सिद्ध किया यह किसी भी लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए शुभसंकेत ही कहा जायेगा। ये अलग बात है कि प्रधानमंत्री के दल और उनकी मात्र संस्था के व्यवहारिक सियासी स्वरूप से अन्य दल सहमत न हो। मगर लोकतंत्र के इस सत्य को नहीं छिपाया जा सकता कि लोकतांत्रिक सरकारों की समाज और संस्थाओं के बीच क्या समस्यायें होती है और लोकतांत्रिक तरीके से उनका समाधान सत्य को सामने रख कैसे निकाला जाता है। निश्चित ही किसी भी मानव, समाज या संस्थाओं के आधार उसके नैसर्गिक गुण ही होते है और उसकी संस्कृति जो उसे प्राराव्ध या मौजूद संसाधनों से प्राप्त होती है। अगर कहीं स्वच्छंद जीवन जीने वालो के समृद्ध जीवन की बाधा उसका शान्तप्रिय जीवन अनादिकाल से रहा है तो इसे एक बडा बदलाव कहा जायेगा। क्योंकि जिस लचीले लोकतंत्र में हमारी कई पीडियों ने सांस ली और समय-समय पर जिन पुरूषार्थियों ने नेतृत्व किया। हो सकता है उनके पक्ष और विपक्ष में सियासी सुविधा अनुसार कुछ सवाल हो। जिनका सदपयोग, दुरूपयोग कर लोग सत्ता तक पहुंचते रहे है। मगर प्रधानमंत्री जी ने जिस तरह से एक कुशल सार्थी की तरह 130 करोड की जनसंख्या वाले रथ को सकुशल खींचने का सियासी संदेश दिया है उस पर देश भर में विचार और चर्चा अवश्य होना चाहिए न कि सत्ता के लिए सियासी वेमनस्यता का माहौल सियासी गलियारों में निर्मित होना चाहिए। प्रधानमंत्री जी की कार्यशैली से स्पष्ट है कि सरकार का नेतृत्व जैसा हो बैसा दिखना ही नहीं मेहसूस भी होना चाहिए। जब देश का जनसमर्थन सदन में सरकार के साथ है तो कडे से कडे सवाल सडक के बजाये सदन में हो तो यह समृद्ध लोकतंत्र की खूबी होगी। मगर जिस तरह की चिन्ता आज हर राष्ट्र के लिए कृतज्ञ नागरिक के बीच समृद्ध, शसक्त सरकारांे के रहते बनी रहती है और कभी-कभी बडा सवाल बन सरकारों के मार्ग की बाधायें बनती है। इनके लिए भी सरकारों को एक निष्ठापूर्ण ईमानदार कोशिश कर स्वयं की कृतज्ञता साबित करना चाहिए। विगत 6 वर्षो से ही नहीं आजादी से लेकर आज तक रोजगार को लेकर जो बडा सवाल हमारी सरकारों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर कलंक साबित होते रहे है। अगर उसके समाधान की कोशिश ईमानदारी से हो, तो न तो भारत जैसे देश में रोजगार की कोई समस्या होगी और न ही सवाल और न ही आशा-आकांक्षा लिए आभावग्रस्त जीवन जीने वाले लोगों का जीवन आभावग्रस्त। सवाल सरकारों की निष्ठापूर्ण और ईमानदार सोच पर निर्भर करता है। क्योंकि भारतवर्ष में समृद्धि की कोई कमी नहीं। अगर कोई कमी है तो मेकाले के तथाकथित विश्व विद्यालय और काॅरपोरेट कल्चर में डूबे सियासी दलों के बीच है। अगर इस सत्य को हमारी सत्तायें और हम सिद्ध कर पाये तो यह उस महान भूभाग की महान विरासत की सिद्धता होगी जिसके आध्यात्म, विज्ञान, गणित का इतिहास आज भी भरा पडा है और नैसर्गिक विधायें, प्रतिभायें लाखों-करोडों की संख्या में मौजूद है। अब इस पर विचार हम सभी को मिलकर करना है। बेहतर हो कि सत्ता के नेतृत्व ग्रेडिंग सिस्टम से बाहर निकल सत्य, संवाद गावं गली तक सुलभ बनायें। समाधान अवश्य मिलेगा क्योंकि प्रतिभा, विद्ववानों से यह भूभाग आज भी पटा पडा है। रोजगार कोई समस्या है ही नहीं सिर्फ सार्थक समाधान देना है।
जय स्वराज
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