दल के खात्मे पर खामो ख्याली............तीरंदाज ?

व्ही.एस.भुल्ले
भैया- कै वाक्य में ही अब म्हारे महान दल का खात्मा हो जायेगा। काडू वोल्या कि अब तो थारे दल का खात्मा होने पर ही थारा कल्याण और समृद्ध, खुशहाल जीवन संभव है। कै भाया वाक्य में ही म्हारी षडयंत्रकारी सियासत जीवन मूल्य सिद्धान्तों की राजनीति इतनी कडवी और कलंकित हो चुकी है। जो काडू जैसा व्यक्ति भी म्हारे दल पर कलंकित कयास लगाने से नहीं चूक रहा। 
भैये- तने तो बावला शै, आखिर मने तू ये बता कि हालिया तौर पर तू किस महान आत्मा के सत्संग या फिर किस महान नेता की सभा सुनकर आ रहा है। कै थारे को मालूम कोणी कि म्हारी दिल्ली में तो अब केजरीवाल प्रोडक्ट छा रहा है। खबर है कि कई राज्यों के मुख्यमंत्री अब हाथों-हाथ मय लावो लश्कर के केजरीवाल फंडे के शोध पर जुट गये है और हाथों-हाथ केजरीवाल फाॅरमूले को लागू करने मन बना चुके है और ऐसे में तू मुंये काडू की बातों में उलझा है। नवनिर्माण के दौर में तने जाप्ते और खात्मे की बात कर रहा है। 
भैया- मने चिन्ता सत्ता, सियासत, सरकार और षडयंत्रपूर्ण स्वार्थवत संस्कृति की नहीं। मने चिन्ता म्हारे जीवन मूल्य सिद्धान्त और सत्य को लेकर है। जिससे आम पीडित वंचित आभावग्रस्त लोगों का जीवन समृद्ध, खुशहान बन सके। मने चिन्ता है म्हारे उस महान विचार की जो  
सत्य को साक्षी मान अपने नैसर्गिक स्वभाव अनुरूप जीवन निर्वहन के साथ निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन तथा सर्वकल्याण का संस्कार और संदेश देता है। कै थारे को मालूम कोणी कि म्हारे महान दल के कुछ शुभचिंतकों ने हालिया मुंह खोला है और 30 वर्ष पश्चात दल के हित में कुछ बोला है। मगर मने न लागे कुछ बडा होने वाला है काॅरपोरेट संस्कृति में संचालित संस्कारिक दलों में कुछ बदलाव होने वाला है। आखिर मने कै करू, जो म्हारी सियासत साफ-सुथरी होने के साथ सर्वकल्याणकारी बन पावे।
भैये- अरे बावले कै थारे को मालूम कोणी कि सर्वकल्याण के लिए तो दिन रात लग्झरी स्टाइल में देशभर में बैठकों का दौर चल रहा है। प्रशिक्षणों का सर्राटा ऐसा कि आंकडा तो लाखों में सिद्ध है। मगर स्वरोजगार का आंकडा बिल्कुल भी नहीं बढ पा रहा है। सियासी दलों की स्वार्थवत संस्कृति सियासत में सर्राटे भर रही, किसी भी दल में कार्यकर्ता कम चापलूस, चाटूकार चुप रहने वालो की भीड बढ रही है। षडयंत्रकारी सियासत का स्वार्थवत इकबाल इस कदर बुलंद है कि सेनापति को भी अब अपनी सेना में दुश्मनों की फौज नजर नहीं आती है। ऐसे में जीवन मूल्य सिद्धान्त से जुडे सर्वकल्याण में आस्था रखने वालों की आत्मा तो आहत होती ही है। स्वार्थवत स्व-कल्याण में डूबे लोगों की जमात सियासत सत्ता में पैर जमा सियासत की महान संस्कृति को सरेयाम चैराहे पर कलंकित करती है। 
भैया- मने समझ लिया थारा इशारा कि अब न तो दल और न ही सियासत को नेता विद्या, विद्यवान और समर्पित स्वाभिमानी कार्यकर्ताओं की जरूरत है। अगर आज के दौर में सत्ता में बने रहना है या सत्ता हासिल करना है तो लगता है जीवन मूल्य सिद्धान्त सर्वकल्याण की सियासत नहीं बल्कि अकूत दौलत के साथ एक गिरोहबंद समूह जो बगैर सवाल किये अंधभक्तों की तरह अपने नेता के हित को ध्यान में रख सर्वकल्याण जीवन मूल्य सिद्धान्त से इतर आमजन के बीच आचार-व्यवहार कर सके। इतना ही नहीं धन, बल के सहारे नई-नई तकनीक के माध्यम से लोगों मंे यह विश्वास पैदा कर सके कि म्हारा दल और नेता दोनों ही महान है। इसलिए भाया मने तो काडू की ही बात केजरीवाल के फंडे को देख सच लागे। जहां बडे-बडे बलशाली आदृश्य शक्तियों से लैस धनुरधारी एक ही प्रहार में सियासी विसात पर चित नजर आ रहे है। इसलिए संदेश साफ है और काडू का कहना भी कि फिलहाल हाफ है कि थारे दल के खात्मे का समय शायद नजदीक है। मगर मैं बापू को कैसे भूल जाऊं जो कभी उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी से चर्चा के दौरान कही थी कि मैं इस समाधान के लिए कोशिश तो कर ही सकता हूं।
जय स्वराज

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