सेवा, सिद्धान्त के जख्मों पर षडयंत्रकारी मरहम सतत सियासी दबाब का दर्द

वीरेन्द्र शर्मा
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
वचन के लिए सडक पर, तो आम नागरिक की खातिर ढाल तलवार के नाम सत्ता संगठन में खिची सियासी संगीनों से म.प्र. में संहार जिसका भी हो, यह तो स्वार्थवत षडयंत्रकारी सियासत के परिणाम ही तय करेंगे। मगर इतना तो तय है कि म.प्र. की सियासत में अपनी जमीन मजबूत करने अगर काॅग्रेस की यह सोची-समझी रणनीति है तो फिर सियासी कयास लगाना बैमानी है। अगर ऐसे में म.प्र. में पैर जमा चुकी स्वार्थवत षडयंत्रकारी सियासत को यह स्पष्ट संदेश है तो निश्चित ही सेवा सिद्धान्तों की सियासत अब सत्ता सौपानों से निकल सडक पर संघर्ष करती म.प्र. में दिखे तो किसी को अतिसंयोक्ति नहीं होना चाहिए जिसकी कि प्रबल संभावनाऐं है। स्पष्ट होती दिख रही है तो किसी को अति संयोक्ति नहीं होना चािहए। 
अगर म.प्र. में सिंधिया को मिली हार को जो लोग सामान्य घटनाक्रम मानते है वह उतने सहज साधारण नहीं कहते है। सियासत में कोई स्थाई मित्र और दुश्मन नहीं होता। अब इस हार को लोग मोदी लहर या सियासी दुश्मन, जातिगत नाराजगी या फिर उन्हीं के सिपहसालारों की चूक का नाम दे। मगर आज हार सत्य के रूप में सभी के सामने है। यह हार सच्चे, सेवा सिद्धान्तों की नहीं बल्कि उस षडयंत्रकारी स्वार्थवत सियासत की है जिसके घोडे पर सवार स्वार्थवत षडयंत्रकारी सियासत अपना साम्राज्य खडा कर, सेवा कल्याण जीवन मूल्य ही नहीं सिद्धान्तों को अपने टापो तले रौंद देना चाहती है। क्योंकि सत्ता उन्मुख स्वार्थवत सियासत स्व-कल्याण में अंधी संस्कृति तथा सिंधिया के सेवा कल्याण जीवन मूल्य सिद्धान्तों की सियासत के मार्ग की बाधा उनका स्वभाव संस्कार और सिपहसालारों के पराक्रम सहित मंत्रणावीरों के हुनर को बखूबी पहचानती है। इसलिए सीधे-सीधे न सही दाय बाॅय ही सही स्वार्थवत षडयंत्रकारी सियासत अपने मंसूबों को सिद्ध करनें से नहीं चूकती। परिणाम की सिंधिया द्वारा आमजन के बीच मूल्य सिद्धान्तों की जबावदेही ओढने पर दल के साथी सहयोगियों के आक्रोश का उन्हें आज भी शिकार होना पढ रहा है। आखिर कौन नहीं जानता कि जब विगत 15 वर्षो से म.प्र. में सक्षम नेतृत्व के अभाव में काॅग्रेस सिकुडकर घडी हो चुकी थी। ऐसे में सडक पर उतर सिंधिया ने ही सत्ता के खिलाफ संघर्ष किया। सत्याग्रह से लेकर गांव, गरीब, किसान की खातिर सत्ताधारी दल को मुंह तोड जबाव दिया। मगर बलिहारी स्वार्थवत, षडयंत्रकारी सियासत और स्वार्थ में डूबी सियासी संस्कृति की, कि सिंधिया आज सत्ता संगठन ही नहीं, अब तो पार्टी तथा जनहित में उनके द्वारा उठाये जाने वाली बातों को भी बगावत, अनुशासनहीनता नाम दें, सिंधिया के जख्मों पर मरहम की जगह षडयंत्रकारी सियासी मरहम लगा, उनके जख्मों को कुरेदने का कार्य चल रहा है जो म.प्र. की नई सियासत के स्पष्ट संदेश कहे जा सकते है। देखना होगा कि इस संघर्ष में जीत स्वार्थवत षडयंत्रकारी उस सियासत की होती है जो स्व-कल्याण में डूब सर्वकल्याण, जीवन, मूल्य सिद्धान्तों की सियासत को दफन कर देना चाहती है। विचार उन सियासी पंडितों और सर्वकल्याण की राजनीति में आस्था रखने वाले जीवन मूल्य और सिद्धान्तों से जुडे लोगों को करना है।  

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