अस्तित्व के संकट पर सियासी घमासान कार्यकर्ताओं की आशा-आकांक्षाओं को पलीता लगाती सत्ता और सियासत
वीरेन्द्र शर्मा
जिस तरह से जीवन मूल्य सिद्धान्त की राजनीति को जीवन का संघर्ष मानने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं को लेकर सियासत, सत्ता अपने ही अस्तित्व को मुंह चिढाने में जुटी है यह सत्य म.प्र. की सियासत में अब किसी से छिपा नहीं। जिस चेहरे को अघोषित तौर पर कांग्रेस विगत 15 वर्षो तक सत्ता के सपने सजोने संघर्ष कर बांट जौती रही। आज सत्ता हासिल होने के पश्चात उसी चेहरे से मुंह छिपाने की सियासत समूचे म.प्र. ही नहीं सियासी हल्कों में सरगर्म है। सडक, खेत, खलिहान से लेकर भोपाल के दशहरे मैदान में सत्याग्रह कर संघर्ष को धार देने वाले सिंधिया ने जनसेवा, जीवन मूल सिद्धान्त को हथियार बना 15 साला पुरानी सत्ता को पस्त करने में माहती भूमिका निभाई। आज सिंधिया के रूप में मौजूद आम कार्यकर्ता की आशा-आंकाक्षाओं से सत्ता और संगठन में हावी स्वार्थपूर्ण सियासत अपने मात्र संगठन के आधार की परवाह किये बगैर ऐसी सियासत में जुटी है जिसका न तो कभी कोई आधार रहा है और न ही भविष्य में रहने वाला है।
जिस तरह से सियासत सुर्खियों के माध्यम से अघोषित तौर पर सिंधिया पर हमलावर बन जनसेवा, जीवन मूल, सिद्धान्तों की सियासत को आयना दिखाने में जुटी है कि न तो सत्ता में ही सिंधिया की कोई उपयोगिता संगठन को दिख रही और नहीं आधार खोते संगठन में एक कार्यकर्ता के रूप में सिंधिया का बजूद। मगर कहते है कि सत्य को आयना दिखाना उतना ही घातक है जिस तरह से सूर्य को रोशनी दिखाना। अब विचार कांग्रेस के ठुलमुल नेतृत्व और उस सियासत को करना है जो स्वार्थवत संस्कृति के चलते स्वयं के मंसूबे गांव, गली की आशा-आकांक्षाओं की आड में पूरा करना चाहती है। सिंधिया के नाम को लेकर सुर्खियों में बनी सियासत आजकल जिस चर्माेत्कर्स पर है उसमें विपक्षी दल ही नहीं बल्कि दल के अंदर ही होने वाले सियासी विरोध आज प्रमाण हो तो कोई अति संयोक्ति नहीं होनी चाहिए। फिलहाल म.प्र. की सियासत अब सत्ता में ताशपोशी को लेकर भले ही कांग्रेस में न हो। मगर जिस तरह की सियासी तलवारें संगठन प्रमुख के पद को लेकर, राज्यसभा की सदस्यता की आड में अघोषित तौर पर खिची हुई है इसके परिणाम जो भी हो। मगर जनसेवा, मूल सिद्धान्त और सत्याग्रह जैसे कारगार अस्त्रों के लिए सियासत में भले ही अनुपयोगी समझा जाये। मगर भविष्य की सियासत का मूल आधार जनसेवा, जीवन मूल सिद्धान्त ही रहने वाले है। देखना होगा कि कांग्रेस जमती बिसात पर ऐसी कौन-सी बिसात बिछाती है जिसमें उसका भविष्य और कांग्रेस कार्यकर्ता का अस्तित्व और आधार तथा उसका स्वाभिमान सुरक्षित रह सके।
जिस तरह से जीवन मूल्य सिद्धान्त की राजनीति को जीवन का संघर्ष मानने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं को लेकर सियासत, सत्ता अपने ही अस्तित्व को मुंह चिढाने में जुटी है यह सत्य म.प्र. की सियासत में अब किसी से छिपा नहीं। जिस चेहरे को अघोषित तौर पर कांग्रेस विगत 15 वर्षो तक सत्ता के सपने सजोने संघर्ष कर बांट जौती रही। आज सत्ता हासिल होने के पश्चात उसी चेहरे से मुंह छिपाने की सियासत समूचे म.प्र. ही नहीं सियासी हल्कों में सरगर्म है। सडक, खेत, खलिहान से लेकर भोपाल के दशहरे मैदान में सत्याग्रह कर संघर्ष को धार देने वाले सिंधिया ने जनसेवा, जीवन मूल सिद्धान्त को हथियार बना 15 साला पुरानी सत्ता को पस्त करने में माहती भूमिका निभाई। आज सिंधिया के रूप में मौजूद आम कार्यकर्ता की आशा-आंकाक्षाओं से सत्ता और संगठन में हावी स्वार्थपूर्ण सियासत अपने मात्र संगठन के आधार की परवाह किये बगैर ऐसी सियासत में जुटी है जिसका न तो कभी कोई आधार रहा है और न ही भविष्य में रहने वाला है। जिस तरह से सियासत सुर्खियों के माध्यम से अघोषित तौर पर सिंधिया पर हमलावर बन जनसेवा, जीवन मूल, सिद्धान्तों की सियासत को आयना दिखाने में जुटी है कि न तो सत्ता में ही सिंधिया की कोई उपयोगिता संगठन को दिख रही और नहीं आधार खोते संगठन में एक कार्यकर्ता के रूप में सिंधिया का बजूद। मगर कहते है कि सत्य को आयना दिखाना उतना ही घातक है जिस तरह से सूर्य को रोशनी दिखाना। अब विचार कांग्रेस के ठुलमुल नेतृत्व और उस सियासत को करना है जो स्वार्थवत संस्कृति के चलते स्वयं के मंसूबे गांव, गली की आशा-आकांक्षाओं की आड में पूरा करना चाहती है। सिंधिया के नाम को लेकर सुर्खियों में बनी सियासत आजकल जिस चर्माेत्कर्स पर है उसमें विपक्षी दल ही नहीं बल्कि दल के अंदर ही होने वाले सियासी विरोध आज प्रमाण हो तो कोई अति संयोक्ति नहीं होनी चाहिए। फिलहाल म.प्र. की सियासत अब सत्ता में ताशपोशी को लेकर भले ही कांग्रेस में न हो। मगर जिस तरह की सियासी तलवारें संगठन प्रमुख के पद को लेकर, राज्यसभा की सदस्यता की आड में अघोषित तौर पर खिची हुई है इसके परिणाम जो भी हो। मगर जनसेवा, मूल सिद्धान्त और सत्याग्रह जैसे कारगार अस्त्रों के लिए सियासत में भले ही अनुपयोगी समझा जाये। मगर भविष्य की सियासत का मूल आधार जनसेवा, जीवन मूल सिद्धान्त ही रहने वाले है। देखना होगा कि कांग्रेस जमती बिसात पर ऐसी कौन-सी बिसात बिछाती है जिसमें उसका भविष्य और कांग्रेस कार्यकर्ता का अस्तित्व और आधार तथा उसका स्वाभिमान सुरक्षित रह सके।
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