जान पर खेल चैराहे, सडक पार करते लोग जबावदेह वेसुध लोग सुरक्षित आवागमन को पलीता लगाती आजादी
वीरेन्द्र शर्मा
म.प्र. का शिवपुरी शहर शायद ऐसा पहला शहर होगा जो आज अव्यवस्थित मनमानी आजादी के बूटोतले स्वच्छंद जीवन को रौंधता दिखे। वेसुध जबावदेही के दंश झेलते शहर में न तो चैराहों न ही सडक पार करने वालो का जीवन सुरक्षित है न ही स्थापित ऐसी कोई व्यवस्था जो यह तय करती दिखती हो कि सडकों, चैराहों पर फर्राटें भरते अनियंत्रित वाहनों पर लगाम कस सके। मनचाहे ढंग से अनियंत्रित रफ्तार में शहर की सडकें नापते वाहन और मनचाहे तरीके से चैराहों पर दौडते वाहन इस बात के गवाह है कि अनियंत्रित आजादी से सराबोर इस शहर में किसी को परिवहन सुधार की जरूरत नहीं। कई मौतें शहर में दौडते अनियंत्रित वाहनों से हो जाने के बावजूद भी इस गंभीर समस्या पर जबावदेहों का संज्ञान न लेना शिवपुरी के सामने एक गंभीर संकट ही कहा जायेगा। बैसे भी अप्रत्याशित अराजक माहौल में अनियंत्रित वाहन सडको की नापजोक में जुटे है तो किसी को अतिसंयोक्ति नहीं होना चाहिए। क्योंकि आये दिन फूटते धमाकों से कपकपाते बेजुबानों की धडकन और देर रात तक बजने वाले डीजों की धमक से परेशान छात्र-छात्राओं की तकलीफ से कौन बाखिफ नहीं। मगर मुक्तहस्त से आजादी का सुख भोगने वालों को इसकी परवाह कहां और किसका डर। फिलहाल तो अनियंत्रित आजादी का दौर शहर में सर चढकर भोगने और बोलने पर मजबूर है। देखना होगा कि कब हमारे संरक्षक इस शहर की सुध लें विधि सम्वत व्यवस्था का आगाज करने में कामयाब हो पाते है।
म.प्र. का शिवपुरी शहर शायद ऐसा पहला शहर होगा जो आज अव्यवस्थित मनमानी आजादी के बूटोतले स्वच्छंद जीवन को रौंधता दिखे। वेसुध जबावदेही के दंश झेलते शहर में न तो चैराहों न ही सडक पार करने वालो का जीवन सुरक्षित है न ही स्थापित ऐसी कोई व्यवस्था जो यह तय करती दिखती हो कि सडकों, चैराहों पर फर्राटें भरते अनियंत्रित वाहनों पर लगाम कस सके। मनचाहे ढंग से अनियंत्रित रफ्तार में शहर की सडकें नापते वाहन और मनचाहे तरीके से चैराहों पर दौडते वाहन इस बात के गवाह है कि अनियंत्रित आजादी से सराबोर इस शहर में किसी को परिवहन सुधार की जरूरत नहीं। कई मौतें शहर में दौडते अनियंत्रित वाहनों से हो जाने के बावजूद भी इस गंभीर समस्या पर जबावदेहों का संज्ञान न लेना शिवपुरी के सामने एक गंभीर संकट ही कहा जायेगा। बैसे भी अप्रत्याशित अराजक माहौल में अनियंत्रित वाहन सडको की नापजोक में जुटे है तो किसी को अतिसंयोक्ति नहीं होना चाहिए। क्योंकि आये दिन फूटते धमाकों से कपकपाते बेजुबानों की धडकन और देर रात तक बजने वाले डीजों की धमक से परेशान छात्र-छात्राओं की तकलीफ से कौन बाखिफ नहीं। मगर मुक्तहस्त से आजादी का सुख भोगने वालों को इसकी परवाह कहां और किसका डर। फिलहाल तो अनियंत्रित आजादी का दौर शहर में सर चढकर भोगने और बोलने पर मजबूर है। देखना होगा कि कब हमारे संरक्षक इस शहर की सुध लें विधि सम्वत व्यवस्था का आगाज करने में कामयाब हो पाते है।
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