आॅनलाइन न हुआ अलाउद्दीन का चिराग हुआ जनकल्याण का माखौल उडाती सत्तायें

व्ही.एस.भुल्ले 
जिस तरह से विगत दो दशक में नेट-इंटरनेट, कम्प्यूटर के नाम से सरकारों में सिद्ध अलाउद्दीन के चिराग के रूप में आॅनलाईन सेवाओं का प्रार्दुभाव हुआ है मानों समाधान सामने ही खडा हो। हाल ही में किसान कल्याण से जुडे निर्णयों में सोलर पंप योजना के क्रियान्वयन का जो पैमाना तय हुआ वह बडा ही हास्यपद है कि 70 फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में निवासरत किसानों को लाभ हासिल करने आॅनलाईन आवेदन करना होगा। हालांकि आम गांव, गली, गरीब के कल्याण के नाम सरकारों द्वारा उडाये जाने वाले माखौल का कोई यह पहला मौका नहीं। इससे पूर्व स्कूलों में टी.व्ही. कम्प्यूटर हर ग्राम पंचायत में टी.व्ही. कम्प्यूटर, लेपटाॅप, टेपलेट, लोकसेवा केन्द्र ड्रायविंग लायसेंस समूचे मनरेगा आॅनलाईन और न जाने क्या-क्या अरबो-खरबों रूपया खर्च कर कई विभाग आॅनलाईन हो चुके है। यह 20 वर्ष का आॅनलाईन कारवां है। अगर सरकारों की ही माने तो भोपाल में बैठे कई मंत्रालयों की बेवसाईड भी आज तक अपडेट नहीें। जिन गांवों में 24 घंटे और नेट केवल पहुंचाने की अभी चर्चायें ही चल रही है तथा शिक्षा का स्तर ध्वस्त पडा हो। उस 70 फीसदी वाले म.प्र. में आॅनलाईन हाईटेक सरकारी योजनाआंे का क्या आलम होगा अंदाजा लगाया जा सकता है। मगर सरकारें दिन में जब गांव, गली, गरीब की 70 फीसदी  आबादी को आॅनलाईन सेवा कल्याण के नाम दिन में तारे दिखाने में जुटी हो तो इससे बडा झूठ किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में हो नहीं सकता। जिस सरकार का 60 फीसदी अमला स्वयं ही वे-लाईन हो और बेवसाईडें अपडेट होने के इंतजार में ऐसे में कैसी सेवा, कैसा कल्याण और कैसे होगी भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था आज सभी को यह समझने वाली बात होना चाहिए। क्योंकि ई-टेडिरिंग में हुये हजारों करोड के घोटाले अभी जांच का विषय है। इस बात को सरकारों को नहीं भूलना चाहिए।  

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