सेवा, सुविधा के सत्यानाश के बीच, जनसेवकों की बोली का ग्राफ 30 करोड के पार लोकतंत्र का काला सच
व्ही.एस.भुल्ले
अगर दो पूर्व मुख्यमंत्री और मंत्रियों के मुख से मीडिया के बीच निकले व्यानों एवं आरोप-अप्रत्यारोपों पर विचार किया जाये तो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में इससे बडी शर्मनाक दर्दनाक और कोई बात हो ही नहीं सकती कि जिस म.प्र. में पढे-लिखे, कुशल-अकुशल लोगों के बेकार हाथों को रोजगार न हो और किसी भी सेवा के नाम खुलेआम शुल्क बसूली का खेल प्रमाणिक तौर पर लोक आयुक्त आर्थिक अपराध के छापों से सिद्ध हो और वह भी अदने से कर्मचारी से लेकर आलाधिकारियों तक ऐसे में एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा, म.प्र. में 15 साल तक शासन करने वाली पार्टी पर, दूसरे दल के चुने हुये जनप्रतिनिधि विधायकों को तोडने 35 करोड तक के आॅफर की बात कहना, तो वहीं दूसरे मुख्यमंत्री द्वारा वर्तमान मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करने की बात कहना आज की सियासत में यह सिद्ध करने काफी है कि अब जनसेवा, सत्याग्रह और विकास कल्याण की सियासत किस तरह से चैराहे पर नीलाम होने तैयार है। अगर इन आरोप-प्रत्यारोपों में जरा भी सच्चाई है तो ना तो यह लोकतंत्र के लिये शुभसंकेत है और न ही म.प्र. के गांव, गली, गरीब के हित में जिस पर आम प्रबुद्ध नागरिक, नेता, दल, बुद्धिजीवियों को अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर सेवा कल्याण के नाम पर सियासत में क्या चल रहा है।
अगर दो पूर्व मुख्यमंत्री और मंत्रियों के मुख से मीडिया के बीच निकले व्यानों एवं आरोप-अप्रत्यारोपों पर विचार किया जाये तो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में इससे बडी शर्मनाक दर्दनाक और कोई बात हो ही नहीं सकती कि जिस म.प्र. में पढे-लिखे, कुशल-अकुशल लोगों के बेकार हाथों को रोजगार न हो और किसी भी सेवा के नाम खुलेआम शुल्क बसूली का खेल प्रमाणिक तौर पर लोक आयुक्त आर्थिक अपराध के छापों से सिद्ध हो और वह भी अदने से कर्मचारी से लेकर आलाधिकारियों तक ऐसे में एक पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा, म.प्र. में 15 साल तक शासन करने वाली पार्टी पर, दूसरे दल के चुने हुये जनप्रतिनिधि विधायकों को तोडने 35 करोड तक के आॅफर की बात कहना, तो वहीं दूसरे मुख्यमंत्री द्वारा वर्तमान मुख्यमंत्री को ब्लैकमेल करने की बात कहना आज की सियासत में यह सिद्ध करने काफी है कि अब जनसेवा, सत्याग्रह और विकास कल्याण की सियासत किस तरह से चैराहे पर नीलाम होने तैयार है। अगर इन आरोप-प्रत्यारोपों में जरा भी सच्चाई है तो ना तो यह लोकतंत्र के लिये शुभसंकेत है और न ही म.प्र. के गांव, गली, गरीब के हित में जिस पर आम प्रबुद्ध नागरिक, नेता, दल, बुद्धिजीवियों को अवश्य विचार करना चाहिए कि आखिर सेवा कल्याण के नाम पर सियासत में क्या चल रहा है।
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