स्थापित विधान की बैवस विधि से वैचेन लोग मजाक उडाते कत्र्तव्य विमुख लोग


व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
बात आज समृद्ध जीवन को अंगीकार कर खुशहाल जीवन की आशा-आकांक्षाओं की बैवसी को लेकर है कि वह बैवस विधि की आड में किस तरह से वैचेन नजर आती है। विधि सम्वत निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन कर विधि की रक्षा सम्मान करने वालों का नव संस्कृति में आज जो हाल है वह किसी से छिपा नहीं। कारण विधि सम्वत कत्र्तव्य विमुख लोगों की बढती संख्या और स्वककल्याण में बढती आस्था को माना जा सकता है। जबकि सम्पूर्ण सत्य सर्वकल्याण में निहित है। इतिहास गवाह है कि हमारे पूर्वजों ने कितनी कठोर त्याग-तपस्या कर ऐसे-ऐसे विधान और संस्कृति, संस्कारों की स्थापना की। जिससे आम जीवन समृद्ध, खुशहाल बन सके। मगर आज जिस तरह से स्थापित विधान और विधि के सत्य को अस्वीकार्य कर सर्वकल्याण से इतर स्वकल्याण की होड मची है वह दर्दनाक भी और शर्मनाक भी। जो विधि की बैवसी को समझने काफी है। जिस असुरक्षा के भाव और भंवर में आज आम इंसान फंसता जा रहा है। हो सकता है कि कोरोना जैसी वेलगाम महामारी के संभावित परिणामों इसे समझने काफी है।
मगर लगता है कि इतनी जल्दी हम स्वभाविक सत्य को समझने वाले है। जिस जीवन को समृद्ध, खुशहाल बनाने स्वार्थवत सत्ताओं समाज ने प्रकृति, आध्यात्म, संस्कृति, संस्कारों का जो नाश किया है और विकास उन्मुख संस्कृति कोरोना जैसे वायरस के आगे चारों खाने चित पडी है यह सृष्टि सृजन का स्पष्ट संकेत है कि समृद्ध, खुशहाल जीवन एक सृष्टि सृजन में सक्षम, सफल पैमाना है जो जीवन का आधार है। बरना धन पिपासुओं की अंधी दौड और स्वार्थवत संस्कृति में डूबी इंसानियत का संघर्ष इसी तरह बैवस और वैचेनी भरा जीवन बना रहने वाला है। 

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