कोरोना के खौफ से कांपी मानवता जीवन सुरक्षा की मोहताज हुई सत्तायें, संसाधन, सरोकार समाधान को मुंह चिढाती नव सभ्यता, संस्कृति और संस्कार

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
''अगर हमारी महान कहावतों को विज्ञान, क्षेत्र सूत्र मान लिया होता तो विलासता में वैभव तलाशती मानव, सभ्यता आज विनाश के कगार पर न खडी होती। अगर कहावतों की माने तो कहावत ये थी कि अगर ऊपर वाले ने चुभ दिया है तो चुना भी देगाÓÓ यूं तो लाईलाज बीमारियों का नये-नये रूप में सामने आना अनादिकाल से लगा आ रहा है। भले ही वह कितनी ही घातक क्यों न रही हो। उनका भी इलाज देर सवेर हासिल होता ही रहा है। फिर चाहे वह काला ज्वर से लेकर टी.व्ही, कैंसर, एड्स, प्लैग, स्वाईन फ्लू, मलेरिया, चिकनगुनिया, हैपीटाईस-बी जैसी जानलेवा बीमारियां रही हो। सभी पर मानव सभ्यता ने जीत हासिल की। मगर कोरोना के खौंफ से जिस तरह से समूचा विश्व मानवता थर्राई है वह आज हर मानव को सृष्टि, सिद्धान्त और सर्वकल्याण के मद्देनजर समझने वाली बात होना चाहिए। कभी समूचे विश्व, मानव जगत को अपने आध्यात्म, तपस्या, निष्ठापूर्ण, कत्र्तव्य निर्वहन से सर्वकल्याण के लिए सिद्धान्ता प्रोयोगिक यथार्थ समाधान देने वाला भूभाग भी कभी इतना आतंकित हो। सुरक्षा के नाम निढाल खडा होगा यह हमारे तपस्वी, त्याग पुरूष पूर्वजों ने अपने निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करते सोचा भी न होगा। 
सर्वकल्याण के लिए स्वस्थ निरोगी जीवन चक्र की कल्पना कर सृष्टि के विज्ञान को आध्यात्मिक प्रायोगिक आधार पर स्थापित कर स्वस्थ समृद्ध, सुरक्षित जीवन देने वाली दिनचर्या स्वस्थ समृद्ध जीवन के जीवन मूल्य सिद्धान्त कडी त्याग-तपस्या कुर्बानी दें स्थापित की है। सुबह ब्रह्म मूर्हत पौने चार बजे उठ शयन वस्त्रों को व्यवस्थित कर घर से दूर शौच, स्नान, व्यायाम पश्चात दूध, फल, औषधि युक्त पौष्टिक आहार दिन के कत्र्तव्य निर्वहन के बीच पौष्टिक आहार और उसकी विधि सूर्य अस्त से पूर्व भोजन और सूर्य अस्त पश्चात फिर सयन इतना ही नहीं ग्रह से लेकर गांव की बनावट के स्थाई मानचित्र दरवाजा, दरवाजें से लगा हाथ पैर धोने का स्थान, स्नान घर, आंगन में तुलसी, रसोई, आने-जाने वालों की खुली बैठक या बरामदा, स्टोर और शयन कक्ष हमारे घरों का मानचित्र होता था। इसी क्रम में गांव और नगरों की वसाहट हुआ करती थी। हर घर में गाय और हर सात दिन में गाय के गोबर से घर की जमीन को लीपकर शुद्ध किया जाना रोजाना भोजन पश्चात रसोई-चूल्हा इत्यादि की सफाई और बर्तनों की कण्डे की राख जैसी ऐन्टीबाइटेक पावउडर से सफाई-मजाई का क्रम दिनचर्या में शामिल था। घर में प्रवेश पूर्व दरवाजा से सटे स्नान घर के पास हाथ पैर धोना और किसी को अभिवादन के वक्त हाथ जोडकर दूर से ही नमस्कार करना धार्मिक कत्र्तव्य निर्वहन के दौरान ताली बजाकर अपने आराध्य की स्तुति करना ये वो छुटपुटे नुक्शे होते थे जिससे जीवन को स्वस्थ रख एक समृद्ध, जीवन जीने का मार्ग प्रस्त होता था। मगर हमने और हमारी स्वार्थवत सत्ता, धन पिपासु सत्ताओं ने अपनी स्वार्थवत महत्वकांक्षा पूर्ति हेतु वर्षो की त्याग-तपस्या तथा हमारे पूर्वजों की अनगिनत कुर्बानियों को दरकिनार कर एक ऐसी नव स्वार्थवत सभ्यता, संस्कृति, संस्कारों एवं षडयंत्रपूर्ण सियासत सत्ताओं को जन्म दिया। जिन्होंने हमारे पूर्वजों की महान विरासत का ही सत्यानाश कर दिया। परिणाम कि हम एक स्वस्थ समृद्ध, विरासत के उत्तराधिकारी कोरोना जैसी महामारी के खौंफ के चलते निढाल खडे है। क्योंकि न हमारे पास व्यक्ति, परिवार, समाज स्तर पर किस तरह की महामारी से बचने बडे स्तर पर कोई मैकना निजम है न ही संसाधन। बेहतर हो कि इस महामारी से बचने तत्काल भीड से दूर कोई ऐसी जगह चिन्हित कर कोरोना से लडने संसाधन जुटाये जाये। जिससे इस तरह की बीमारियों से सुरक्षित सामना करने हम सशक्त और समृद्ध बन सके। 
जय स्वराज

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