स्वराज से समाधान तक, जीवन, संघर्ष, सेवा की सार्थकता कोरोना से व्यक्ति, परिवार, समाज, संस्थायें, सत्ता, सरकार, सभी को एक साथ लडना होगा राष्ट्रीय, प्रादेशिक, जिला, नगर, कस्बों की सीमाऐं सील हो तथा सीमा पर ही स्क्रेनिंग, सेनेट्राईजेशन के साथ, सडक तथा एयर टैक्सियों की व्यवस्था करनी होगी हर जिले में अस्थाई आईसुलेशन वार्ड के अलावा एक राष्ट्रीय त्रिस्तरीय आईसुलेशन जांच, शोध, समाधान केन्द्र एयर टैक्सियों से लैस तत्काल स्थापित हो शट-डाउन के साथ संभावित क्षेत्रों, घरों का हो सेनेट्राईजेशन
व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
ज्ञात हो कि जब देश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 40 के पार भी नहीं हुई थी तब इन सुझावों के साथ व्यवस्थाओं को आगाह किया गया था जिससे यह महामारी व्यापक रूप न ले सके। खुशी की बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री ने कोरोना की गंभीरता और व्यवस्था में मौजूद स्थिति को देखते हुये राष्ट्र के नाम अपना संदेश दिया और एक दिन का स्व-प्रेरित जनता कफ्र्यू का आव्हान किया जिसे एक सुखद संदेश 130 करोड के देश में कहा जा सकता है और भारतवर्ष के मानव, जगत की कृतज्ञता को पहचाना जा सकता है। अगर ऐसा ही आगे भी हम लोग देखकर सीखकर समझकर सटीक सलाह पश्चात स्व-प्रेरणा से स्व-शासित अनुशासित जीवन निर्वहन करते है तो निश्चित ही हम कोरोना जैसी महामारी को हराने में कामयाब अवश्य होगें। शायद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शुरू से ही स्वराज की प्रेरणा हर व्यक्ति, हर जीव के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से ओतप्रोत रही है। मगर विगत 35 वर्षो में जिस तरह से सत्ता, सियासतों के संरक्षण में अप्रत्याशित नवनिर्मित तथाकथित संस्कृति, संस्कार, व्यक्ति, समाज, परिवारों में स्थापित हुये और जीवन, निर्वहन में जो अप्रत्याशित बदलाव हुये कह सकते है कि इस तथाकथित संस्कृति, संस्कारों ने ही एक समृद्ध, स्वस्थ, खुशहाल व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र को इतने बडे धर्म और कर्म संकट में डाल दिया है जिसके दुष्परिणाम कोरोना जैसी महामारी के रूप में हमारे सामने है।
कत्र्तव्य से अधिक अधिकारों की जंग छेडने के जुनून में हम आज इतने निढाल हो गये कि जिस चैराहे पर आज हम खडे है वहां से कोरोना के कहर का विनाश स्पष्ट नजर आता है। जिससे बचाव में अब न तो हमारे विधान, संविधान की शक्तियां और विश्व में मौजूद महाशक्तियां, विज्ञान, मौजूद संसाधन, समाधान देते नजर आते है। अगर यो कहे कि आज मौजूद अकूत दौलत, शौहरत, विज्ञान, शक्तियां-महाशक्तियां कोरोना के आगे हाफते नजर आ रहे है तो कोई अति संयोक्ति न होगी। बहरहाल अगर हम फिजूल की बातें छोड कोरोना को हराने स्वप्रेरित स्वयं के राज से अपने जीवन निर्वहन में स्वयं परिवार, समाज, राष्ट्र और समूची मानव सभ्यता की सुरक्षा स्वास्थ्य के लिये कामयाब होते है तो कोरोना हमारा कुछ नहीं बिगाड सकता। इसलिये समझने वाली बात यह है कि हम स्वयं अनुशासित रह अपने परिवार और आसपास के लोगों को अनुशासित जीवन निर्वहन करने में कत्र्तव्य अनुसार निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के लिये प्रेरित करने और लोगों को अगर काम न हो तो घर में ही सावधानीपूर्वक रहने तथा एक दूसरे के संपर्क न आने के लिये कुछ दिनों के लिये प्रेरित करते है तो यह आज के समय में हमारी सबसे बडी कृतज्ञता और मानव के रूप में सार्थकता होगी। साथ ही शासन के निर्देशानुसार तथा प्रधानमंत्री के आव्हान और चिन्ता अनुसार अगर उनका सम्मान कर हम अपना-अपना कत्र्तव्य निर्वहन करते है तो यह हमारी सबसे बडी परिवार, समाज, राष्ट्र, भक्ति, धर्म और मानव के रूप में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले व्यक्ति की सार्थकता होगी जो आज समय की सबसे बडी जरूरत है।
जय स्वराज
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
ज्ञात हो कि जब देश में कोरोना संक्रमित लोगों की संख्या 40 के पार भी नहीं हुई थी तब इन सुझावों के साथ व्यवस्थाओं को आगाह किया गया था जिससे यह महामारी व्यापक रूप न ले सके। खुशी की बात यह है कि देश के प्रधानमंत्री ने कोरोना की गंभीरता और व्यवस्था में मौजूद स्थिति को देखते हुये राष्ट्र के नाम अपना संदेश दिया और एक दिन का स्व-प्रेरित जनता कफ्र्यू का आव्हान किया जिसे एक सुखद संदेश 130 करोड के देश में कहा जा सकता है और भारतवर्ष के मानव, जगत की कृतज्ञता को पहचाना जा सकता है। अगर ऐसा ही आगे भी हम लोग देखकर सीखकर समझकर सटीक सलाह पश्चात स्व-प्रेरणा से स्व-शासित अनुशासित जीवन निर्वहन करते है तो निश्चित ही हम कोरोना जैसी महामारी को हराने में कामयाब अवश्य होगें। शायद हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि शुरू से ही स्वराज की प्रेरणा हर व्यक्ति, हर जीव के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन से ओतप्रोत रही है। मगर विगत 35 वर्षो में जिस तरह से सत्ता, सियासतों के संरक्षण में अप्रत्याशित नवनिर्मित तथाकथित संस्कृति, संस्कार, व्यक्ति, समाज, परिवारों में स्थापित हुये और जीवन, निर्वहन में जो अप्रत्याशित बदलाव हुये कह सकते है कि इस तथाकथित संस्कृति, संस्कारों ने ही एक समृद्ध, स्वस्थ, खुशहाल व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र को इतने बडे धर्म और कर्म संकट में डाल दिया है जिसके दुष्परिणाम कोरोना जैसी महामारी के रूप में हमारे सामने है। कत्र्तव्य से अधिक अधिकारों की जंग छेडने के जुनून में हम आज इतने निढाल हो गये कि जिस चैराहे पर आज हम खडे है वहां से कोरोना के कहर का विनाश स्पष्ट नजर आता है। जिससे बचाव में अब न तो हमारे विधान, संविधान की शक्तियां और विश्व में मौजूद महाशक्तियां, विज्ञान, मौजूद संसाधन, समाधान देते नजर आते है। अगर यो कहे कि आज मौजूद अकूत दौलत, शौहरत, विज्ञान, शक्तियां-महाशक्तियां कोरोना के आगे हाफते नजर आ रहे है तो कोई अति संयोक्ति न होगी। बहरहाल अगर हम फिजूल की बातें छोड कोरोना को हराने स्वप्रेरित स्वयं के राज से अपने जीवन निर्वहन में स्वयं परिवार, समाज, राष्ट्र और समूची मानव सभ्यता की सुरक्षा स्वास्थ्य के लिये कामयाब होते है तो कोरोना हमारा कुछ नहीं बिगाड सकता। इसलिये समझने वाली बात यह है कि हम स्वयं अनुशासित रह अपने परिवार और आसपास के लोगों को अनुशासित जीवन निर्वहन करने में कत्र्तव्य अनुसार निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के लिये प्रेरित करने और लोगों को अगर काम न हो तो घर में ही सावधानीपूर्वक रहने तथा एक दूसरे के संपर्क न आने के लिये कुछ दिनों के लिये प्रेरित करते है तो यह आज के समय में हमारी सबसे बडी कृतज्ञता और मानव के रूप में सार्थकता होगी। साथ ही शासन के निर्देशानुसार तथा प्रधानमंत्री के आव्हान और चिन्ता अनुसार अगर उनका सम्मान कर हम अपना-अपना कत्र्तव्य निर्वहन करते है तो यह हमारी सबसे बडी परिवार, समाज, राष्ट्र, भक्ति, धर्म और मानव के रूप में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने वाले व्यक्ति की सार्थकता होगी जो आज समय की सबसे बडी जरूरत है।
जय स्वराज
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