अपह्त हुआ लोकतंत्र बैवस हुआ विधान

वीरेन्द्र भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।

अगर समृद्ध, सतत वैद्यानिक लोकतंत्र के विधान की सिद्धि और सार्थकता पर विचार हो तो विधि सम्वत व्यवस्था में चुने हुये जनप्रतिनिधि लाखों करोडो जनता का सदन में प्रतिनिधित्व करने के प्रतीक होते है। जब घूमने फिरने के नाम सामूहिक रूप से अपनी जनता और मतदाताओं को छोड सैकडो किलोमीटर दूर होटलों में समय बितायें। जिस पर घोषित-अघोषित आरोप अपहत करने या बंधक बनाकर रखने के हो, ऐसे में विधि की बैवसी साफ नजर आती है। जिस तरह का घटनाक्रम कर्नाटक, महाराष्ट्र के बाद आजकल म.प्र. में देखने और सुनने मिल रहा है वह सेवा कल्याण विकास के नाम किसी भी सभ्य व्यवस्था में शर्मनाक ही कहा जायेगा। 
अगर लोकतंत्र में विधि की बैवसी इस तरह के घटनाक्रमों की जननी है तो इसमें सुधार अवश्यम भावी हो जाता है। जिस तरह का जनबल, धनबल, बाहुबल का खेल सत्ता के लिए सर्वकल्याण के नाम हो रहा है वह सूचना क्रान्ति के दौर में किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं कहे जा सकते है। आज जब आमजन को सत्ताओं से तत्काल राहत की दरकार है। ऐसे में लोकतंत्र की बैवसी की चर्चा होना स्वभाविक है। देखना होगा कि आम सियासी लोग और आमजन म.प्र. में घटते इस घटनाक्रम को कैसे लेते है।

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