विरासत को भूल, विनाश के कगार पर खडी, समृद्ध संस्कृति
वीरेन्द्र भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सुबह पौने चार बजे उठ सयन संसाधनों को सु-व्यवस्थित रख शौच के लिए घर के बाहर जाना और पुनः घर प्रवेश से पूर्व हाथ पैर धोना, पोछना तथा किसी व्यक्ति से अभिवादन के लिए हाथ जोड अभिवादन करना सुबह ताली बजाकर आराधना करना हर सात दिन में घर में गाय के गोबर से लिपाई-पुताई और भोजन पकाने पश्चात चूल्हे की पुताई भोजन पश्चात बर्तनों की राख से सफाई तथा औषधियों और प्रचुर मात्रा में मौजूद विटामिनों से भरपूर भोजन हमारे नैसर्गिक संस्कार रहे है। फल, दूध, दही, मक्खन-घी हमारे खाद्य के अगुवा रहे है। मगर हम विनाशक संस्कृति के प्रभाव में ऐसे रचे बसे कि आज हम ऐसे मुकाम तक जा पहुंचे जिसके दुष्परिणाम एक भयाभय तबाही के रूप में जब-तब सामने आते रहते है। अगर हमारे संस्कार यहीं रहे तो हमारा आने वाला भविष्य स्वस्थ समृद्ध बना रहे इसमें संदेह स्वभाविक है।
क्योंकि हम अनादिकाल से कभी लापरवाह हलाल नहीं रहे। बल्कि हमारे पूर्वजों ने कडी तपस्या और उच्च संस्कार तथा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के चलते एक ऐसी संस्कृति और संस्कारों को जन्म दिया जो समूचे विश्व के लिए आक्रशित करने एक अबूझ पहेली बनते रहे। मगर जिस विनाशक संस्कृति के पैरोकार बन हम आराम तलब और अलाल होते गये उसके चलते प्रसंग बस ऐसी विभीसकाये सार्थक होती दिखाई दे रही है। जिसकी चर्चा लोग आज गांव, गली ही नहीं राष्ट्र और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जोरो पर है। काश हमने अपनी महान विरासत संस्कृति, संस्कारों का सम्मान कर उन्हें आत्मसात कर अपनो को उस महान संस्कृति में ढाला होता तो न तो कभी हम प्लैग, एक्स, चिकनबुनिया, हैप्पीटाईटस-बी, स्वाइन फ्लू और अब विदेशों में कहर बरपाता महाविनाशक वायरस कैरोना को लेकर चिंतित न होते। हमारा महान भूभाग अनादिकाल से आध्यात्म ही नहीं हर विधा और संसाधनों से समृद्ध रहा है। जो हमारी ऐतिहासिक पहचान है। मगर स्वार्थवत महत्वकांक्षी सत्ताओं ने हमेशा से ही सर्वकल्याणकारी इंसानियत से सराबोर सर्वोच्च कर्म की कृतज्ञ सत्ताओं के विश्वास को तोडा है और ऐसी स्वार्थवत सत्ताओं ने सृजन इंसानियत कत्र्तव्य निर्वहन से विमुख होने का समय-समय पर परिचय दिया है। जो समृद्ध, सफल सृजन में अक्षम्य भी है और अस्वीकार्य भी। जो समूचे जीव-जगत विधा, विद्यवान, सियासतों को समझने वाली बात होनी चाहिए। सृजन में सर्वकल्याण के तरीके गुणवक्ता के आधार पर अलग-अलग हो सकते है। मगर लक्ष्य अलग-अलग नहीं हो सकते और लक्ष्य हासिल करने में सर्वोच्चतम मापदण्ड भारतीय संस्कृति की आत्मा में निहित है। उन्हीं संस्कारों का परिणाम है कि हम विभिन्न पद्धतियों के प्राचीन पुरोदा ही नहीं वर्तमान दौर के भी समृद्ध अगुवा आज भी है। अब विचार हमें करना है।
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
सुबह पौने चार बजे उठ सयन संसाधनों को सु-व्यवस्थित रख शौच के लिए घर के बाहर जाना और पुनः घर प्रवेश से पूर्व हाथ पैर धोना, पोछना तथा किसी व्यक्ति से अभिवादन के लिए हाथ जोड अभिवादन करना सुबह ताली बजाकर आराधना करना हर सात दिन में घर में गाय के गोबर से लिपाई-पुताई और भोजन पकाने पश्चात चूल्हे की पुताई भोजन पश्चात बर्तनों की राख से सफाई तथा औषधियों और प्रचुर मात्रा में मौजूद विटामिनों से भरपूर भोजन हमारे नैसर्गिक संस्कार रहे है। फल, दूध, दही, मक्खन-घी हमारे खाद्य के अगुवा रहे है। मगर हम विनाशक संस्कृति के प्रभाव में ऐसे रचे बसे कि आज हम ऐसे मुकाम तक जा पहुंचे जिसके दुष्परिणाम एक भयाभय तबाही के रूप में जब-तब सामने आते रहते है। अगर हमारे संस्कार यहीं रहे तो हमारा आने वाला भविष्य स्वस्थ समृद्ध बना रहे इसमें संदेह स्वभाविक है।क्योंकि हम अनादिकाल से कभी लापरवाह हलाल नहीं रहे। बल्कि हमारे पूर्वजों ने कडी तपस्या और उच्च संस्कार तथा निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के चलते एक ऐसी संस्कृति और संस्कारों को जन्म दिया जो समूचे विश्व के लिए आक्रशित करने एक अबूझ पहेली बनते रहे। मगर जिस विनाशक संस्कृति के पैरोकार बन हम आराम तलब और अलाल होते गये उसके चलते प्रसंग बस ऐसी विभीसकाये सार्थक होती दिखाई दे रही है। जिसकी चर्चा लोग आज गांव, गली ही नहीं राष्ट्र और अन्तराष्ट्रीय स्तर पर जोरो पर है। काश हमने अपनी महान विरासत संस्कृति, संस्कारों का सम्मान कर उन्हें आत्मसात कर अपनो को उस महान संस्कृति में ढाला होता तो न तो कभी हम प्लैग, एक्स, चिकनबुनिया, हैप्पीटाईटस-बी, स्वाइन फ्लू और अब विदेशों में कहर बरपाता महाविनाशक वायरस कैरोना को लेकर चिंतित न होते। हमारा महान भूभाग अनादिकाल से आध्यात्म ही नहीं हर विधा और संसाधनों से समृद्ध रहा है। जो हमारी ऐतिहासिक पहचान है। मगर स्वार्थवत महत्वकांक्षी सत्ताओं ने हमेशा से ही सर्वकल्याणकारी इंसानियत से सराबोर सर्वोच्च कर्म की कृतज्ञ सत्ताओं के विश्वास को तोडा है और ऐसी स्वार्थवत सत्ताओं ने सृजन इंसानियत कत्र्तव्य निर्वहन से विमुख होने का समय-समय पर परिचय दिया है। जो समृद्ध, सफल सृजन में अक्षम्य भी है और अस्वीकार्य भी। जो समूचे जीव-जगत विधा, विद्यवान, सियासतों को समझने वाली बात होनी चाहिए। सृजन में सर्वकल्याण के तरीके गुणवक्ता के आधार पर अलग-अलग हो सकते है। मगर लक्ष्य अलग-अलग नहीं हो सकते और लक्ष्य हासिल करने में सर्वोच्चतम मापदण्ड भारतीय संस्कृति की आत्मा में निहित है। उन्हीं संस्कारों का परिणाम है कि हम विभिन्न पद्धतियों के प्राचीन पुरोदा ही नहीं वर्तमान दौर के भी समृद्ध अगुवा आज भी है। अब विचार हमें करना है।
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