कागजी घोडो पर सवार, राहत बनी, आफत कोरोना की जंग को कमजोर करती कुव्यवस्था

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
कहते है जीवन को चोट पहुंचाने में जिस तरह से जमजुओं की परम्परा मानवीय जीन में रही है उसी तरह आज की व्यवस्था में कुव्यवस्था सत्ता, शासन, समाज या फिर सरकारों में हो। कहते है जो स्वभाव जमजुओं का जीवन में घातक होता है वहीं स्वभाव किसी भी व्यवस्था में कुव्यवस्था का होता है। मगर कहते है मानव सभ्यता अनादिकाल से ही निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन के साथ सेवाभावी सर्वकल्याणकारी रही है। जो कि कोई भी सत्ता, शासन व्यवस्था का मूल आधार होता है। मगर महा विपदा के वक्त जब स्वयं देश के प्रधानमंत्री राज्य सरकारों से एवं शासकों से कुछ महीने के लिये सिर्फ स्वास्थ्य सेवा और कोरोना जैसी महामारी से जंग का आव्हान करते, आग्रह करते, आगाह करते। ऐसे में व्यवस्था, समाज तथा सेवा, कल्याण निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन में पैठ जमाये तथाकथित कत्र्तव्य विमुख लोगो का क्या ? जो मौत के मुहाने पर खडी मानवता को देख कत्र्तव्य विहीन या धन लालसा में जुटे तथाकथित धन लालची आज भी कत्र्तव्य विमुख हो लोगों की जिन्दगी से खिलवाड करने में जुटे है। 
कागजी घोडो पर सवार मलाई काटू, अस्त बल, आमजन ही नहीें अपने-अपने घर में बैठे प्रथम पंक्ति में कोरोना से मुकाबला करने वालो ने प्रधानमंत्री के एक इशारे पर अपना सबकुछ दाव पर लगा एक सैनिक के रूप में जुट गया। यहां तक कि अपनी आशा-आकांक्षाओं को तिलांजलि दें कोरोना को निस्तानाबूत करने मोर्चे पर तैनात है। आज सात दिन अग्रिम पंक्ति में कोरोना से मोर्चा संम्हाले घरों में बैठे आम नागरिकों को हो चुका है। कोरोना से आरपार की जंग कितने दिनों और चलेगी फिलहाल किसी को नहीं पता। मगर देश के प्रधानमंत्री ने 14 अप्रैल तक का समय भीषण संग्राम के लिये सुनिश्चित कर रखा है। मगर आम अग्रिम पंक्ति में कोरोना से जंग करने वालों का दर्द यह है कि जितना राशन, दवा, पानी उनके पास है वह धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है। मगर कागजी घोडो पर सवार अस्तबल अभी भी यह सुनिश्चित करने में नाकामयाब साबित हो रहा है कि रसद पानी, दवा सप्लाई की चैन मजबूत कैसे बनी रह सकती है और कोरोना की चैन कैसे परास्त हो सकती है।
जबकि होना तो यह चाहिए था कि जब देश के प्रधानमंत्री ने 21 दिन के लाॅकडाउन की घोषणा की और 22 मार्च को कोरोना के खिलाफ आरपार की जंग का ऐलान किया उसी समय राज्य सरकारों को अपने-अपने जिलों एवं राजधानी स्तर पर कंट्रोल रूम स्थापित कर लोगों की सुरक्षा, स्वास्थ्य, राशन, पानी के लिये युद्ध स्तर पर मोर्चा सम्हाल लेना चाहिए था तथा प्रधानमंत्री की मंशा अनुरूप सारे काम छोड सिर्फ कोरोना की रोकथाम तथा स्वास्थ्य सेवा में राज्य सरकारों को जुट जाना चाहिए था। मगर सभी सरकारें अपने-अपने अनुभव और आदत अनुसार जुटी रहीं। परिणाम कि लोग एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश एक जिले से दूसरे जिले तक कोरोना के खिलाफ मोर्चा लेने पैदल मार्च में जुटे है या फिर जो लोग अपने-अपने घरों में कैद हो पहली पंक्ति के युद्ध में दो-दो हाथ करने में जुटे है। अब अपनी पिछली पंक्ति रसद, दवा, सप्लाई की चैन टूटते देख चितिंत है। मगर धन्य है इस भारतवर्ष के महान नागरिक कि वह किसी भी स्थिति में कोरोना से एक इंच भी पीछे हटने तैयार नहीं और पूरे जोश खरोश से अपने-अपने घरों में बंद है और शासन प्रशासन से प्राप्त होने वाले आदेश निर्देशों का निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन करने में जुटे है। अगर राज्य सरकारें अभी भी केन्द्रियकृत कंट्रोलरूम तथा जिला स्तर पर कट्रौल रूम खोल आवश्यक संसाधन जुटाने में खासकर सुरक्षा दवा और राशन पानी सहित सुबह-शाम की गतिविधियों का ब्यौरा देने का काम जिला व प्रदेश स्तर के कट्रौल रूम से करती है तो निश्चित ही जीत भारत की होनी है। कहते है कि जिस देश के महान नागरिकों ने 21 दिन क्या 21 महीनों तक भूखे, प्यासे रह मानवता और राष्ट्र-कल्याण के लिये अपनी जान की परवाह किये बगैर युद्ध लडे हो वह रशद पानी के आभाव के आगे कैसे मोर्चा छोड सकते है। इसलिये विजयी इस भारत और भारत के महान नागरिकों की ही होगी यह आज के समय हमें समझने वाली बात होनी चाहिए। 
जय स्वराज 

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