मानव अस्तित्व की जननी मातृ-शक्ति अनादिकाल से अबला नहीं सबला रही है मातृ-शक्ति का सृजन में निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन उसके सामर्थ, सिद्धि में बड़ी बाधा

व्ही.एस.भुल्ले
विलेज टाइम्स समाचार सेवा।
अगर मातृ-शक्ति में ममत्व का महान भाव और कत्र्तव्य निर्वहन के प्रति आघात आस्था सृजन में न होती तो आज भी मातृ-शक्ति से बडा समूचे जीव-जगत में सिद्ध और कोई सामर्थ न होता। जो उसकी सिद्धि में एक बड़ी बाधा रहा है। परिणाम कि जिस मातृ-शक्ति को आज अबला के रूप में तो कहीं संरक्षण, सम्बर्धन बतौर माना जाता है। असल में मातृ-शक्ति सृष्टि सृजन में स्वतः ही सिद्ध है। समझने वाली बात आज यह है कि जिस मातृ-शक्ति के निष्ठापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन को भूल लोग उसके सशक्तिकरण कल्याण, उत्थान की बात करते है शायद उनकी विधा, ज्ञान, विज्ञान अधूरा है। अगर हमारी आस्था, धर्म में है तो हर धर्म में मातृ-शक्ति की महिमा और उनकी सिद्धता अनादिकाल से सर्वोच्च रही है और जब तक सृष्टि में सृजन का कारवां बढता रहेगा तब तक मातृ-शक्ति की अपनी सर्वोच्चता समस्त जीव-जगत में बनी रहेगी। आज मातृ-शक्ति को संरक्षण, सम्बर्धन, सशक्तिकरण नहीं उसके स्थापित मान-सम्मान और स्वाभिमान के प्रति नमन और कृतज्ञता का वक्त है जो स्वयं में सिद्ध और सार्थक सफल है। अगर यह भाव यह संस्कृति और संस्कार को समूचा मानव जगत पुर्न स्थापित कर स्वयं की कृतज्ञता सिद्ध कर पाया तो सृष्टि, सृजन में हर मानव का कृतज्ञतापूर्ण कत्र्तव्य निर्वहन पूर्णनिष्ठा के साथ माना जायेगा।
जय स्वराज

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