घोडे की शै से, खत्म सियासत.............तीरंदाज ?
व्ही.एस.भुल्ले
भैया- ये तो जमा-जमाया सत्ता का खेल ही खत्म हो लिया। मोहरो से भरी शतरंज पर बजीर, हाथी, ऊंट बैवस पडे है और प्यादे खत्म सियासत के खेल में संघर्ष कर सफर
में जुटे है। सुना है मामला रैफरियों के हाथों से भी निकल अब थर्ड एम्पायर के चैखटों तक जा पहुंचा है। कै मने शतरंज पर मोहरों की जमी-जमाई बाजी समेट लूं या फिर थर्ड एम्पायर के निर्णय आने तक का इंतजार करूं। मगर कै करू अगर चैसर का खेल रहा होता तो फिर भी उल्टे पासे फिक जाते। मगर भाया ये तो शतरंज है। बैसे भी काडू बोल्या शतरंज में घोडे की शै बडी ही खतरनाक होवे। जिसके सामने कोई मोहरा सीधा अडदंग नहीं आता। क्योंकि शतरंज में घोड़ा ही ऐसा मोहरा होता है जो ढाई घर चलता है। क्या भैया वाक्य में ही म्हारी जमी-जमाई सत्ता, सियासत का खेल खत्म।
भैये- मुये चुप कर कै थारे को मालूम कोणी म.प्र. की सियासत में फिलहाल आरपार का खेल चल रहा है। घोडे की ढैया से बजीर बादशाह ऊंट, हाथी ही नहीं प्यादों तक का दम निकल रहा है, तो कहीं आक्रोश बढ रहा है।
भैया- तो क्या मुराद में मिली म्हारी सत्ता की मिलकीयत यूं ही सरेआम लुट जायेगी और म्हारे बापू के विचारों की समाधि पर छाती कूटने वालों की जमात सत्ता छोड सडक पर आ जायेगी। भाया सच बोलना सेवा, सत्ता, सियासत के खेल में क्या वाक्य में ही धोखा बेमानी, गद्दारी हुई है या फिर सियासी महत्वकांक्षायें म्हारे फल-फूलते निजाम को ले डूबी है।
भैये- सुनना चाहे तो पहले खेल के नियम कायदे सुन और फिर परिणामों की ईबारत बुन, कै तने महाभारत सुनी-पडी है तो बेमानी, धोखा, गद्दारी चैसर के खेल में संभव है। जिसके चलते महाभारत का भीषण युद्ध हुआ और उस धर्म युद्ध में बडे-बडे बलशाली धरासायी हो लिये। मगर भैये अब जमाना सियासत सत्ता में चैसर का नहीं, 64 घरों वाली शतरंज का है। जिसकी जैसी गणना उसकी बैसी चाल। बैसे भी शतरंज में खिलाडी का ध्यान मोहरे मारने में कम बचाने में ज्यादा होना चाहिए। बस यहीं चूक हो गई बरना बाजी थारी होती।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा सारी करतूत प्रायोजक-आयोजकों की लागे। जिन्होंने खेल की टाईम लिमिट, समय-सीमा निर्धारित कर सारी बाजी सियासत में जीत की महत्वकांक्षा के चलते बिगाडी, बरना म्हारी सत्ता सियासत का खेल लम्बा खिंचता और शतरंज का खेल भी खूब जमता।
भैया- तो क्या म्हारे बापू की मंशा म्हारे ही प्रदेश में सत्ता सियासत के महत्वकांक्षी के खेल में इस बेरहमी से कुचल दी जायेगी।
भैये- अरे बावले बापू की 150वीं जयंती के अवसर पर अब बापू किसी एक के नहीं रहे, बल्कि बापू तो अब सियासत की ग्लोबल धरोहर हो लिये। भविष्य में सत्ता जिसकी भी बने बिगडे बापू पर अब कोई फर्क नहीं पडने वाला सत्ता सियासत में अब वहीं व्यक्ति रहेगा जो गांव, गली को सुरक्षित और जीवन को स्वस्थ, समृद्ध, संस्कारिक, शिक्षा देगा।
भैया- मने तो लागे सत्ता शतरंज तो मशखरों का मजाक है असल तो गौवंश का श्राफ ही म्हारी षडयंत्रकारी महत्वकांक्षी सत्ता, सियासत, शराफत को ले डूबा। काश मने समय रहते सत्ता, सियासत शराफत के गूढ रहस्यों को समझ लिया होता तो आज म्हारी जमी-जमाई सत्ता, सियासत का ऐसा सत्यानाश नहीं हुआ होता। बोल भैया कैसी रही।
भैया- ये तो जमा-जमाया सत्ता का खेल ही खत्म हो लिया। मोहरो से भरी शतरंज पर बजीर, हाथी, ऊंट बैवस पडे है और प्यादे खत्म सियासत के खेल में संघर्ष कर सफरमें जुटे है। सुना है मामला रैफरियों के हाथों से भी निकल अब थर्ड एम्पायर के चैखटों तक जा पहुंचा है। कै मने शतरंज पर मोहरों की जमी-जमाई बाजी समेट लूं या फिर थर्ड एम्पायर के निर्णय आने तक का इंतजार करूं। मगर कै करू अगर चैसर का खेल रहा होता तो फिर भी उल्टे पासे फिक जाते। मगर भाया ये तो शतरंज है। बैसे भी काडू बोल्या शतरंज में घोडे की शै बडी ही खतरनाक होवे। जिसके सामने कोई मोहरा सीधा अडदंग नहीं आता। क्योंकि शतरंज में घोड़ा ही ऐसा मोहरा होता है जो ढाई घर चलता है। क्या भैया वाक्य में ही म्हारी जमी-जमाई सत्ता, सियासत का खेल खत्म।
भैये- मुये चुप कर कै थारे को मालूम कोणी म.प्र. की सियासत में फिलहाल आरपार का खेल चल रहा है। घोडे की ढैया से बजीर बादशाह ऊंट, हाथी ही नहीं प्यादों तक का दम निकल रहा है, तो कहीं आक्रोश बढ रहा है।
भैया- तो क्या मुराद में मिली म्हारी सत्ता की मिलकीयत यूं ही सरेआम लुट जायेगी और म्हारे बापू के विचारों की समाधि पर छाती कूटने वालों की जमात सत्ता छोड सडक पर आ जायेगी। भाया सच बोलना सेवा, सत्ता, सियासत के खेल में क्या वाक्य में ही धोखा बेमानी, गद्दारी हुई है या फिर सियासी महत्वकांक्षायें म्हारे फल-फूलते निजाम को ले डूबी है।
भैये- सुनना चाहे तो पहले खेल के नियम कायदे सुन और फिर परिणामों की ईबारत बुन, कै तने महाभारत सुनी-पडी है तो बेमानी, धोखा, गद्दारी चैसर के खेल में संभव है। जिसके चलते महाभारत का भीषण युद्ध हुआ और उस धर्म युद्ध में बडे-बडे बलशाली धरासायी हो लिये। मगर भैये अब जमाना सियासत सत्ता में चैसर का नहीं, 64 घरों वाली शतरंज का है। जिसकी जैसी गणना उसकी बैसी चाल। बैसे भी शतरंज में खिलाडी का ध्यान मोहरे मारने में कम बचाने में ज्यादा होना चाहिए। बस यहीं चूक हो गई बरना बाजी थारी होती।
भैया- मने समझ लिया थारा इसारा सारी करतूत प्रायोजक-आयोजकों की लागे। जिन्होंने खेल की टाईम लिमिट, समय-सीमा निर्धारित कर सारी बाजी सियासत में जीत की महत्वकांक्षा के चलते बिगाडी, बरना म्हारी सत्ता सियासत का खेल लम्बा खिंचता और शतरंज का खेल भी खूब जमता।
भैया- तो क्या म्हारे बापू की मंशा म्हारे ही प्रदेश में सत्ता सियासत के महत्वकांक्षी के खेल में इस बेरहमी से कुचल दी जायेगी।
भैये- अरे बावले बापू की 150वीं जयंती के अवसर पर अब बापू किसी एक के नहीं रहे, बल्कि बापू तो अब सियासत की ग्लोबल धरोहर हो लिये। भविष्य में सत्ता जिसकी भी बने बिगडे बापू पर अब कोई फर्क नहीं पडने वाला सत्ता सियासत में अब वहीं व्यक्ति रहेगा जो गांव, गली को सुरक्षित और जीवन को स्वस्थ, समृद्ध, संस्कारिक, शिक्षा देगा।
भैया- मने तो लागे सत्ता शतरंज तो मशखरों का मजाक है असल तो गौवंश का श्राफ ही म्हारी षडयंत्रकारी महत्वकांक्षी सत्ता, सियासत, शराफत को ले डूबा। काश मने समय रहते सत्ता, सियासत शराफत के गूढ रहस्यों को समझ लिया होता तो आज म्हारी जमी-जमाई सत्ता, सियासत का ऐसा सत्यानाश नहीं हुआ होता। बोल भैया कैसी रही।
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